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जब किसी गांव की सड़क वर्षों तक नहीं बनती, अस्पताल में डॉक्टर नहीं मिलते, बिजली-पानी की समस्या बनी रहती है, सरकारी योजनाओं का लाभ पात्र लोगों तक नहीं पहुंचता या भ्रष्टाचार के कारण विकास कार्य अधूरे रह जाते हैं, तब आम जनता का गुस्सा स्वाभाविक रूप से सामने आता है। लेकिन अक्सर देखा जाता है कि इस नाराज़गी का सबसे बड़ा निशाना सीधे देश के प्रधानमंत्री बन जाते हैं। सोशल मीडिया पर तीखी टिप्पणियां और आलोचनाएं शुरू हो जाती हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हर समस्या के लिए केवल प्रधानमंत्री ही जिम्मेदार हैं? भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहां शासन व्यवस्था कई स्तरों पर संचालित होती है। केंद्र सरकार राष्ट्रीय नीतियां बनाती है, बजट आवंटित करती है और देश के विकास की दिशा तय करती है। वहीं राज्य सरकारें, जिला प्रशासन, नगर निकाय, पंचायतें, स्थानीय अधिकारी और क्षेत्र के जनप्रतिनिधि उन योजनाओं को धरातल पर उतारने का काम करते हैं। यदि किसी क्षेत्र में विकास कार्य समय पर पूरे नहीं होते, योजनाओं में अनियमितता होती है या जनता को मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ता है, तो उसकी जिम्मेदारी संबंधित स्तरों पर भी तय होनी चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देश और विदेश में एक प्रभावशाली नेता के रूप में देखा जाता है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की भूमिका को मजबूत करने, वैश्विक संबंधों को विस्तार देने और कई राष्ट्रीय योजनाओं को आगे बढ़ाने के कारण उन्हें व्यापक पहचान मिली है। वहीं दूसरी ओर, यदि किसी गांव में सड़क नहीं बनती, किसी अस्पताल में दवाइयों की कमी रहती है, किसी कार्यालय में अधिकारी जनता की शिकायत नहीं सुनते या किसी योजना में भ्रष्टाचार होता है, तो इन समस्याओं की जांच स्थानीय स्तर पर भी होनी चाहिए। लोकतंत्र में जवाबदेही केवल शीर्ष नेतृत्व तक सीमित नहीं होती, बल्कि हर अधिकारी और जनप्रतिनिधि की भी होती है। यह भी सच है कि जनता अपने मत से सरकार चुनती है और बेहतर व्यवस्था की उम्मीद करती है। इसलिए जनता को शिकायत करने और सवाल पूछने का पूरा अधिकार है। लेकिन प्रभावी लोकतंत्र की पहचान यही है कि सवाल सही व्यक्ति और सही संस्था से पूछे जाएं। यदि किसी विभाग का अधिकारी अपने दायित्वों का पालन नहीं कर रहा है, यदि कोई जनप्रतिनिधि जनता की समस्याओं को गंभीरता से नहीं उठा रहा है या यदि योजनाओं में लापरवाही हो रही है, तो उनकी जिम्मेदारी भी तय होना आवश्यक है। आज आवश्यकता इस बात की है कि केवल नाराज़गी व्यक्त करने के बजाय जवाबदेही की पूरी श्रृंखला को समझा जाए। विकास तभी संभव है जब केंद्र सरकार की योजनाएं ईमानदारी से राज्यों, जिलों और गांवों तक पहुंचें। यदि बीच की किसी कड़ी में लापरवाही होती है, तो उसका नुकसान अंततः आम नागरिक को उठाना पड़ता है। लोकतंत्र में आलोचना आवश्यक है, लेकिन वह तथ्यों और जिम्मेदारी के सही निर्धारण पर आधारित होनी चाहिए। जनता का उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष को दोष देना नहीं, बल्कि व्यवस्था को बेहतर बनाना होना चाहिए। जब हर स्तर पर जवाबदेही तय होगी, अधिकारी अपने दायित्वों का ईमानदारी से निर्वहन करेंगे, जनप्रतिनिधि जनता के प्रति उत्तरदायी रहेंगे और योजनाओं का लाभ बिना भेदभाव के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचेगा, तभी लोकतंत्र की वास्तविक सफलता और सुशासन का उद्देश्य पूरा होगा। Chief Editor : Hemant Gupta 8959884334, 8959059983 |