रतलाम / सैलाना
रतलाम जिले के सैलाना और बाजना सहित मध्यप्रदेश के 89 आदिवासी बाहुल्य विकासखंडों में संचालित विकासखंड शिक्षा अधिकारी (बीईओ) कार्यालय वर्षों से लगभग निष्क्रिय स्थिति में हैं।
शासन हर वर्ष इन कार्यालयों के अधिकारी-कर्मचारियों के वेतन-भत्तों पर करोड़ों रुपये खर्च कर रहा है, जबकि इन कार्यालयों के पास स्थायी और पर्याप्त कार्य नहीं है। इस व्यवस्था पर महालेखाकार (AG) भी आपत्ति जता चुका है।
1990 में बनी थी व्यवस्था
प्रदेश के स्कूल शिक्षा विभाग ने वर्ष 1990 में सहायक शाला निरीक्षक के पद समाप्त कर विकासखंड शिक्षा अधिकारी (BEO) पद सृजित किए थे। उद्देश्य था कि प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालयों के शिक्षकों के वेतन, भत्ते और अन्य प्रशासनिक कार्य विकासखंड स्तर पर ही हो सकें, ताकि शिक्षकों को जिला मुख्यालय के चक्कर न लगाने पड़ें। साथ ही स्कूलों की मॉनिटरिंग भी स्थानीय स्तर पर हो सके।
इसके बाद वर्ष 2016 में वित्त
विभाग ने हायर सेकेंडरी स्कूलों के प्राचार्यों से आहरण एवं संवितरण अधिकार लेकर बीईओ को सौंप दिए, जिससे कक्षा 1 से 12 तक के कर्मचारियों के भुगतान संबंधी कार्य बीईओ कार्यालयों से किए जाने लगे।
आदिवासी क्षेत्रों में लागू नहीं हो सकी व्यवस्था
सैलाना और बाजना जैसे आदिवासी विकासखंडों में यह व्यवस्था कभी प्रभावी रूप से लागू नहीं हो सकी। यहां के अधिकांश स्कूल जनजातीय कार्य विभाग के अधीन संचालित होते हैं। ऐसे में शिक्षकों के वेतन, भुगतान और प्रशासनिक कार्य अब भी सहायक आयुक्त, जनजातीय कार्य विभाग कार्यालय से ही संचालित होते हैं।
परिणामस्वरूप बीईओ कार्यालयों के पास नियमित कार्य नहीं बचा और अधिकांश अमला निष्क्रिय बना हुआ है।
अधिकारी काम में, अमला खाली
जानकारों के अनुसार, इन क्षेत्रों में स्कूल शिक्षा विभाग अपने नियमित बीईओ नियुक्त करने में भी रुचि नहीं लेता। लंबे समय से जनजातीय विभाग की अनुशंसा पर वरिष्ठ प्रधान अध्यापकों को अतिरिक्त प्रभार के रूप में बीईओ बनाया जाता रहा है। अधिकारी किसी संस्था के संचालन में व्यस्त रहते हैं, लेकिन उनके अधीनस्थ कर्मचारी अधिकांश समय बिना काम के रहते हैं।
साल में कुछ ही बार मिलता है काम
बीईओ कार्यालयों को वर्ष में केवल साइकिल वितरण, पुस्तक वितरण, वार्षिक परीक्षा मॉनिटरिंग जैसे सीमित कार्य ही मिलते हैं। दूसरी ओर जिला शिक्षा कार्यालयों और जनजातीय विभाग पर काम का भारी दबाव बना रहता है।
प्रत्येक विकासखंड कार्यालय में औसतन 6 से 8 कर्मचारियों का अमला पदस्थ है।
महालेखाकार ने भी जताई आपत्ति
महालेखाकार ग्वालियर की ऑडिट टीम ने भी बिना पर्याप्त कार्य के वेतन भुगतान पर आपत्ति दर्ज की थी। ऑडिट में आदिवासी क्षेत्रों में संचालित बीईओ कार्यालयों की उपयोगिता पर सवाल उठाए गए, लेकिन अब तक कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया।
विधानसभा में भी उठा था मुद्दा
वर्ष 2009 में तत्कालीन कांग्रेस विधायक प्रभुदयाल गेहलोत ने यह मामला विधानसभा में उठाया था, लेकिन स्थिति आज भी जस की तस बनी हुई है।
क्या हो सकता है समाधान
विशेषज्ञों का मानना है कि समग्र शिक्षा अभियान के तहत कक्षा 1 से 12वीं तक की योजनाओं का संचालन पहले ही जिला शिक्षा अधिकारी और बीआरसी स्तर से किया जा रहा है। ऐसे में आदिवासी विकासखंडों के निष्क्रिय बीईओ कार्यालय समाप्त कर वहां के कर्मचारियों को जिला शिक्षा कार्यालयों में समायोजित किया जा सकता है।
इससे शासन पर अतिरिक्त वित्तीय भार भी नहीं आएगा और जिला कार्यालयों पर बढ़ते कार्यभार को कम करने में मदद मिलेगी।
अधिकारियों की प्रतिक्रिया
बीआरसी सैलाना नरेंद्र कुमार पासी ने कहा ---
कि वर्तमान में वेतन आहरण, सर्विस बुक संधारण एवं तकनीकी विसंगतियों के निराकरण के लिए ब्लॉक स्तर पर विकेंद्रीकरण बेहद आवश्यक हो गया है। उन्होंने बताया कि प्रदेश के 78 विकासखंडों में ट्राइबल विभाग के बीईओ के माध्यम से वेतन आहरण की व्यवस्था पहले से संचालित है, जबकि सैलाना और बाजना जैसे आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में अब भी शिक्षकों को छोटी-छोटी प्रशासनिक प्रक्रियाओं के लिए जिला मुख्यालय पर निर्भर रहना पड़ता है।
इससे समय और संसाधनों दोनों की अनावश्यक बर्बादी होती है।
शिक्षक संगठनों का कहना है कि वर्तमान व्यवस्था के चलते वेतन निर्धारण, एरियर, जीपीएफ, अवकाश स्वीकृति और सेवा पुस्तिका से जुड़े मामलों में अनावश्यक देरी होती है। कई बार शिक्षकों को बार-बार कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। विभागीय स्तर पर भी माना जा रहा है कि ब्लॉक शिक्षा कार्यालय पहले से साइकिल वितरण, पाठ्यपुस्तक वितरण, वार्षिक परीक्षाओं की मॉनिटरिंग और शैक्षणिक गतिविधियों के संचालन जैसी जिम्मेदारियां संभाल रहे हैं।
ऐसे में यदि ब्लॉक स्तर पर आहरण शक्ति प्रदान की जाती है तो प्रशासनिक दबाव कम होगा, वित्तीय प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और गति आएगी तथा शिक्षकों को स्थानीय स्तर पर त्वरित राहत मिल सकेगी।
रंजना सिंह, सहायक आयुक्त, जनजातीय विभाग रतलाम ने कहा---
सैलाना और बाजना के स्कूलों के वेतन आहरण सहित सभी कार्य जिला कार्यालय से ही होते हैं। जिला कार्यालय पर कार्य का भारी दबाव है। बीईओ कार्यालय रहें या नहीं, यह नीतिगत विषय है।
वहीं अशोक लोढ़ा, जिला शिक्षा अधिकारी रतलाम ने कहा---
सैलाना और बाजना बीईओ कार्यालयों में कार्य कम है, जबकि जिला स्तर पर कार्य का दबाव अधिक है। सामान्य विकासखंडों में बीईओ कार्यालयों की भूमिका महत्वपूर्ण रहती है। यह निर्णय जिला स्तर का नहीं, बल्कि शासन स्तर का विषय है।
नईदुनिया वरिष्ठ पत्रकार वीरेंद्र त्रिवेदी नें कहा---
वरिष्ठ पत्रकार एवं लंबे समय तक निजी विद्यालय का संचालन कर चुके वीरेन्द्र त्रिवेदी ने कहा कि शासन को कम से कम हर पांच वर्ष में विभागों की उपयोगिता की समीक्षा अवश्य करनी चाहिए।
यदि कोई विभाग व्यावहारिक रूप से अप्रभावी हो चुका है तो उस पर हो रहे अनावश्यक खर्च पर पुनर्विचार होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि वर्षों तक स्कूल संचालन और शिक्षा व्यवस्था को नजदीक से देखने के दौरान आदिवासी क्षेत्रों में बीईओ कार्यालय की विशेष आवश्यकता महसूस नहीं हुई। अधिकांश कार्य बीआरसी के माध्यम से संचालित हो रहे हैं। बीईओ कार्यालय के पास जो सीमित कार्य शेष हैं, उन्हें भी बीआरसी को सौंपा जा सकता है।
त्रिवेदी ने सुझाव दिया कि बीईओ कार्यालय के कर्मचारियों को विभाग में जहां स्टाफ की कमी है, वहां समायोजित किया जाए। उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य यह है कि इस दिशा में गंभीरता से देखने वाला कोई नजर नहीं आता।
रिपोर्टर : जितेंद्र कुमावत