रतलाम/शिवगढ़
जंगल बचाने और हरियाली बढ़ाने के नाम पर खर्च होने वाली सरकारी राशि यदि जमीन पर दिखाई ही न दे तो सवाल उठना लाजिमी है। रतलाम जिले के शिवगढ़ वन परिक्षेत्र की बासिंद्रा दक्षिण बीट से सामने आया मामला अब इसी सवाल को बेहद गंभीर बना रहा है। यहां कैम्पा मद से वर्ष 2021 से 2026 तक कराए गए वृक्षारोपण और उससे जुड़े कार्यों में कथित फर्जीवाड़े, अधूरे काम, संदिग्ध वाउचर और भुगतान में अनियमितता के आरोप लगाए गए हैं।
वन विभाग के ही एक जाबांज चौकीदार ईश्वर मुनिया ने विभाग के आला अधिकारियों की पोल खोलकर रख दी और लगभग सभी जुड़े अधिकारी भी जांच के घेरे में आ गए है। चौकीदार का आरोप है कि वनरक्षक देवेंद्र सिंह देवड़ा और रेंजर विष्णु पाटीदार ने मिलकर लाखों करोडो रुपये का भ्रष्टाचार किया है।
मामले की गंभीरता इसलिए बढ़ गई है क्योंकि शिकायतकर्ता ईश्वर मुनिया, जो लंबे समय से इसी वन क्षेत्र में सुरक्षा श्रमिक के रूप में कार्य कर रहे हैं, ने पहले वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को शिकायतें दीं, फिर RTI के जरिए वर्षवार वाउचर मांगे और अंततः 31 अगस्त 2026 को लोकायुक्त पुलिस अधीक्षक उज्जैन को भी शिकायत भेज दी। अब विभागीय जांच सैलाना रेंजर राधेश्याम जोशी एवं वन विभाग की टीम द्वारा की जा रही है।
लेकिन इसी बीच हमारी मीडिया टीम जब मौके पर पहुंची तो जमीन पर दिखाई दी स्थिति ने पूरे मामले को और गंभीर स्थिति देखने को मिली दोबाई दो के गड्डों की जगह 4 से 6 इंच तक के गड्डे दिखे ।
कागजों में 50 हजार गड्ढे, मौके पर क्या मिला?
पी-58 क्षेत्र को लेकर शिकायत में 50 हेक्टेयर में 50 हजार गड्ढे और पौधरोपण का उल्लेख है। लेकिन मौके पर मीडिया टीम को कई स्थानों पर निर्धारित आकार के गड्ढे दिखाई नहीं दिए।
कहीं केवल 4 से 6 इंच के आसपास की उथली खुदाई, तो कहीं जमीन पर गड्ढे के नाम पर मामूली निशान नजर आए। कई स्थानों पर तो पौधे लगाने के लिए गड्ढे तक नहीं दिखे और जमीन केवल जेसीबी से साफ की हुई नजर आई।
यदि तय संख्या में गड्ढे नहीं खोदे गए; 50,000 की जगह केवल 30,000 से 35,000 गड्ढे ही करवाए गए (लगभग 15,000 गड्ढे कम खोदे गए)।
रिकॉर्ड में हजारों गड्ढे पूर्ण दर्ज हैं तो मौके पर उनकी वास्तविक स्थिति क्या है—यही अब इस पूरे मामले की सबसे बड़ी जांच बन गई है।
जांच से एक रात पहले रात में दौड़ी जेसीबी
मामले का सबसे सनसनीखेज पहलू शिकायतकर्ता ईश्वर मुनिया द्वारा बताया गया घटनाक्रम है। उनका कहना है कि अपनी कमियों को छिपाने के लिए रात के समय जेसीबी मशीन लगाकर गड्ढे करवाए गए, पौधे लाए गए और मजदूरों से आनन-फानन में (दो गैंती मारकर) पौधे लगवाए गए। जांच दल के मौके पर पहुंचने से ठीक एक रात पहले रात में जेसीबी लगाकर गड्ढे खोदने का काम शुरू किया गया।
रात के समय अचानक मशीनें चलती देखकर वे स्वयं हैरान रह गए।
अब सवाल यह है कि यदि गड्ढे पहले ही तैयार थे और संबंधित कार्य पूर्ण बताए गए थे, तो जांच से ठीक पहले रात में जेसीबी क्यों चलाई गई?
क्या यह पहले से अधूरे पड़े काम को आनन-फानन में पूरा दिखाने की कोशिश थी या इसका कोई दूसरा कारण था? इसका जवाब जांच में सामने आना बाकी है।
सिर्फ गड्ढे ही नहीं, पूरा सिस्टम सवालों के घेरे में
बासिंद्रा दक्षिण की शिकायत केवल गड्ढों तक सीमित नहीं है। शिकायतकर्ता ने पौधरोपण, खाद-मिट्टी, लेन्टाना सफाई, निंदाई-गुड़ाई, थाले, अग्नि पट्टी, फायर वॉचर, सुरक्षा श्रमिक, निरीक्षण पथ, चेकडैम/कंटूर और तार फेंसिंग सहित कई कार्यों की जांच की मांग की है।
यानी सवाल सिर्फ यह नहीं कि गड्ढे कितने खोदे गए।
सवाल यह भी है कि—
गड्ढों में खाद और मिट्टी डाली गई या नहीं?
कितने पौधे वास्तव में लगाए गए?
कितने पौधे जीवित हैं?
कितने पौधे मर चुके हैं?
निंदाई-गुड़ाई वास्तव में हुई या सिर्फ वाउचर बने?
अग्नि पट्टी और फायर वॉचर का काम हुआ या नहीं?
निरीक्षण पथ मजदूरों ने बनाया या मशीन से औपचारिकता हुई?
तार फेंसिंग वास्तव में लगी या उसके नाम पर भुगतान हुआ?
सुरक्षा श्रमिक वास्तव में मौजूद थे या कागजों पर?
इन सभी सवालों का जवाब अब दस्तावेज और मौके की संयुक्त जांच से ही मिल सकता है।
वाउचर से बैंक खाते तक जांच की मांग
ईश्वर मुनिया ने आरोप लगाया है कि कुछ कार्यों में मजदूरों के नाम पर वाउचर बनाकर भुगतान किया गया और ऐसे खातों की भी जांच होनी चाहिए जो वास्तविक कार्यस्थल से दूर रहने वाले लोगों के हैं।
इसी कारण उन्होंने RTI के माध्यम से वर्षवार मजदूरों की सूची, वाउचर और भुगतान से संबंधित दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियां मांगी थीं।
अब यदि विभागीय रिकॉर्ड में दर्ज प्रत्येक मजदूर के नाम, बैंक खाते, भुगतान की तारीख और मौके पर उसकी वास्तविक उपस्थिति का मिलान कराया जाता है तो कथित फर्जी भुगतान की सच्चाई सामने आ सकती है।
चौकीदार का दावा—मैं अकेला सुरक्षा करता रहा
शिकायतकर्ता ईश्वर मुनिया का कहना है कि वे लंबे समय से बासिंद्रा दक्षिण क्षेत्र में सुरक्षा श्रमिक के रूप में काम कर रहे हैं और कई वर्षों तक उन्होंने अकेले ही वन क्षेत्र की सुरक्षा की।
उन्होंने अपने बैंक खाते की पूरी जांच कराने की मांग की है। उनका दावा है कि सुरक्षा श्रमिकों के नाम पर होने वाले भुगतान की भी जांच की जाए और देखा जाए कि कागजों में जिन लोगों को भुगतान किया गया, उन्होंने वास्तव में जंगल में काम किया था या नहीं।
RTI से खुल सकता है पूरा रिकॉर्ड
ईश्वर मुनिया ने 14 जुलाई 2026 को सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 6(1) के तहत वन मंडल कार्यालय रतलाम में आवेदन देकर बासिंद्रा दक्षिण के विभिन्न वर्षों के कार्यों से संबंधित रिकॉर्ड मांगा।
उन्होंने गड्ढे खुदाई से लेकर पौधरोपण, खाद-मिट्टी, निंदाई-गुड़ाई, अग्नि पट्टी, फायर वॉचर, सुरक्षा श्रमिक, निरीक्षण पथ, चेकडैम/कंटूर और फेंसिंग तक के वाउचर एवं मजदूरों की सूची मांगी।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि मांगी गई सूचनाएं समय पर उपलब्ध नहीं कराई गईं। यही कारण है कि उन्होंने बाद में वरिष्ठ अधिकारियों और लोकायुक्त तक शिकायत पहुंचाई।
24 जुलाई से 31 अगस्त तक शिकायतों की पूरी श्रृंखला
मामला अचानक सामने नहीं आया।
24 जुलाई 2026 को ईश्वर मुनिया ने अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक (कैम्पा) सहित वरिष्ठ वन अधिकारियों को बासिंद्रा दक्षिण के वृक्षारोपण कार्यों की जांच के लिए शिकायत भेजी।
इसके बाद 31 अगस्त 2026 को वन मंडलाधिकारी रतलाम को अपीलीय अभ्यावेदन दिया गया।
इसी दिन लोकायुक्त पुलिस अधीक्षक, विशेष पुलिस स्थापना, उज्जैन को भी शिकायत भेजकर कथित भ्रष्टाचार की जांच की मांग की गई।
अर्थात मामला पहले विभागीय स्तर पर उठाया गया और बाद में लोकायुक्त तक पहुंचा।
अब जांच अधिकारी के सामने बड़ी चुनौती
मामले की जांच सैलाना रेंजर राधेश्याम जोशी कर रहे हैं। जांच अधिकारी के स्तर से यह बताया गया है कि जांच रिपोर्ट डीएफओ रतलाम को प्रस्तुत की जाएगी और जांच में जो तथ्य सामने आएंगे, उनके अनुसार कार्रवाई होगी।
यही वह बिंदु है जहां अब विभाग की जांच की असली परीक्षा होगी।
क्योंकि केवल फाइल देखकर जांच पूरी करना पर्याप्त नहीं होगा। यदि शिकायत में लगाए गए आरोपों की वास्तविकता जांचनी है मोके पर प्रोजेक्ट एवं समस्त बाउचर जाँच के समक्ष लेकर उपस्थित रहकर मौके पर गड्ढों की गिनती, उनकी गहराई-माप, पौधों की संख्या, जीवित-मृत पौधों का आंकड़ा, खाद-मिट्टी, फेंसिंग, अग्नि पट्टी, निरीक्षण पथ और अन्य कार्यों का भौतिक सत्यापन करना होगा।
इसके साथ ही संबंधित वाउचर और बैंक भुगतान का भी मिलान करना होगा। बीट अधिकारी देवेंद्र देवड़ा द्वारा अपने परिवार जनों एवं अपने रिश्तेदारों और तो और अपने मिलने वालों के बैंक खातों में राशि डाली गई वह सभी जांच के घेरे में है!
ग्राम नाल में बिजली के नाम पर बिट अधिकारी द्वारा देवेंद्र देवड़ा पर ₹40 हजार लेने का भी आरोप
इस पूरे मामले में चौकीदार की जानकारी अनुसार एक और बड़ा मामला सामने आया है की ग्राम नाल में बिजली लाइन के लिए कथित ₹40 हजार की वसूली का मामला भी सामने आया है।
चौकीदार ने बताया की वर्ष 2025 में ग्राम नाल तक बिजली पहुंचाने के लिए बिजली विभाग/एमपीआईडीसी स्तर से पोल लगाने का काम शुरू हुआ था। जिस का काम बिट अधिकारी देवेंद्र सिंह देवड़ा ने रोक लगादी आरोप है कि वन भूमि का हवाला देकर वन विभाग की अनुमति/एनओसी के लिए बिना काम रुकवा दिया गया।
इसके बाद ग्रामीणजनों ने बिजली लाइन की अनुमति लाने के लिए कथित तौर पर ग्राम स्तर पर कुल ₹40 हजार एकत्रित कर बिट अधिकारी देवेंद्र देवड़ा को अनुमति दिलाने के लिए दिए गए।
चौकीदार ने बताया ग्रामीणजनों से राशि लेने के बावजूद उन्हें न तो कोई विधिवत रसीद दी गई और न ही अनुमति का स्पष्ट पत्र उपलब्ध कराया गया। बिजली लाइन का काम भी पूरा नहीं हुआ और मौके पर पोल खड़े रह गए।
यदि यह आरोप सही पाया जाता है तो यह केवल वन कार्यों से जुड़ी अनियमितता नहीं, बल्कि ग्रामीणों से सरकारी अनुमति के नाम पर कथित वसूली का अलग गंभीर मामला होगा। इसकी पुष्टि के लिए राशि लेने-देने वालों के बयान, बैंक लेनदेन, बिजली विभाग के रिकॉर्ड, वन विभाग की एनओसी प्रक्रिया और मौके पर लगे विद्युत पोलों की स्थिति की जांच जरूरी है।
जंगल की जमीन खुद पूछ रही है सवाल
बासिंद्रा दक्षिण में सामने आया मामला केवल एक बीट या एक वृक्षारोपण क्षेत्र का सवाल नहीं है। यह उस पूरी व्यवस्था पर सवाल है जिसमें सरकारी राशि से जंगलों में पौधे लगाने और उन्हें बचाने के लिए योजनाएं बनाई जाती हैं।
अगर रिकॉर्ड में हजारों गड्ढे हैं लेकिन जमीन पर गड्ढे नहीं मिलते, अगर पौधरोपण दर्ज है लेकिन पौधे नजर नहीं आते, अगर सुरक्षा श्रमिकों का भुगतान दर्ज है लेकिन श्रमिक मौजूद नहीं हैं और अगर जांच से ठीक पहले रात में मशीनें चलती हैं—तो हर बिंदु की निष्पक्ष जांच जरूरी हो जाती है।
अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि जंगल में कितने पौधे लगे। सवाल यह है कि पौधों के नाम पर खर्च हुई सरकारी राशि जमीन तक कितनी पहुंची?
वन विभाग के सामने अब शिकायतकर्ता के आरोप, RTI में मांगे गए दस्तावेज और मीडिया टीम के मौके के अवलोकन—तीनों को सामने रखकर जांच करने की चुनौती है।
बासिंद्रा दक्षिण की जमीन पर दिखाई दे रहे गड्ढे अब सिर्फ पौधे लगाने की जगह नहीं, बल्कि सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच का सबसे बड़ा सबूत बन गए हैं।
अब देखना यह है कि जांच रिपोर्ट जंगल की जमीन पर दिख रही हकीकत को दर्ज करती है या फाइलों में दर्ज आंकड़ों को।
रिपोर्टर जितेन्द्र कुमावत