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आगर-मालवा : जिले में खरीफ सीजन उपरान्त कटाई का कार्य जारी है। आगर-मालवा जिले में खरीफ की मुख्य फसल सोयाबीन है। सोयाबीन कटाई उपरान्त बचे हुए फसल अवशेषों का उपयोग पशुओं के चारे एवं जैविक खाद के रूप में किया जा सकता है। कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को सलाह दी है कि फसल अवशेष को जलाना नहीं चाहिए, इससे मृदा में कार्बनिक पदार्थों का नुकसान होता है, लाभकारी सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते हैं तथा हानिकारक गैसों का उत्सर्जन होता है। फसल अवशेषों के उचित प्रबंधन हेतु वैज्ञानिकों द्वारा दो प्रमुख उपाय सुझाए गए हैं। इन-सीटू तकनीकों द्वारा जिले में फसल अवशेष प्रबंधन यंत्र जैसे सुपर सीडर, स्ट्रॉ रीपर, श्रेडर/मल्चर, रोटावेटर जैसे यंत्रों से अवशेषों को मिट्टी में मिलाकर उसे उपजाऊ बनाया जा सकता है। साथ ही सोयाबीन कटाई उपरान्त जमीन में नमी होने से कृषकों को वेस्ट डीकंपोजर (भूसे सड़ाने के जीवाणु) से अवशेषों को खाद के रूप में मिट्टी में मिलाया जा सकता है। वेस्ट डीकंपोजर के उपयोग से जीवाणु एवं कवक नरवाई का अपघटन कर भूमि को पोषक तत्व प्रदान करते हैं, जिससे रासायनिक उर्वरक पर निर्भरता कम होती है। कृषि विज्ञान केन्द्र ने किसानों से अपील की है कि नरवाई ना जलायें, मिट्टी की सेहत बचायें, खेतों में नरवाई मिलायें, मिट्टी को उपजाऊ बनायें। फसल अवशेष नहीं जलायेंगे, स्वच्छ हवा हम पायेंगे। फसल अवशेष जलाना है नुकसान, अवशेषों का प्रबंधन है समाधान। |