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धार्मिक आय पर दोहरा मापदंड: राम मंदिर के चढ़ावे पर राजनीति क्यों? कारसेवक पं. राधेश्याम उपाध्याय ने उठाए सवाल, कहा— सनातन आस्था के केंद्रों को निशाना बनाना बंद हो नीमच। अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण और प्राण-प्रतिष्ठा के बाद मंदिर की आय एवं चढ़ावे को लेकर चल रही चर्चाओं पर कारसेवक एवं पूर्व अध्यक्ष कर्मकाण्डीय विप्र पुजारी परिषद, नीमच पं. राधेश्याम उपाध्याय ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने धार्मिक आय को लेकर अपनाए जा रहे कथित दोहरे मापदंडों पर सवाल उठाते हुए कहा कि श्रीराम मंदिर के चढ़ावे पर अनावश्यक हाय-तौबा मचाने वाले लोग अन्य धर्मस्थलों की आय और व्यय पर कभी चर्चा नहीं करते। पं. उपाध्याय ने कहा कि श्रीराम मंदिर का निर्माण 500 वर्षों से अधिक लंबे संघर्ष, हजारों संतों एवं सनातन धर्मावलंबियों के बलिदान तथा लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद संभव हो सका है। इसके बावजूद कुछ लोग मंदिर निर्माण से लेकर प्राण-प्रतिष्ठा तक लगातार विरोध करते रहे और आज भी मंदिर की आय को लेकर भ्रम फैलाने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि श्रीराम मंदिर की आय-व्यय व्यवस्था पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए, यह अपेक्षा स्वयं सनातन समाज की भी है। लेकिन मंदिर के चढ़ावे को राजनीतिक मुद्दा बनाना उचित नहीं है। उनका मानना है कि मंदिरों से प्राप्त धन का उपयोग सनातन संस्कृति, अध्यात्म, संस्कार, धर्म संरक्षण एवं समाज के ज्ञानवर्धन जैसे कार्यों में होना चाहिए। पं. उपाध्याय ने कहा कि प्राचीन काल में मंदिरों की आय का उपयोग धर्म, शिक्षा और संस्कृति के संरक्षण हेतु किया जाता था तथा शासक वर्ग इस धन को अत्यंत पवित्र मानता था। उन्होंने वर्तमान व्यवस्था पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि मंदिरों के प्रबंधन के लिए योग्य, समर्पित एवं धर्मनिष्ठ व्यक्तियों का एक स्वतंत्र सनातन बोर्ड गठित किया जाना चाहिए, जिससे धार्मिक संस्थानों का संचालन अधिक प्रभावी एवं पारदर्शी ढंग से हो सके। उन्होंने कहा कि यदि शासन व्यवस्थाओं के लिए मंदिर प्रबंधन चुनौतीपूर्ण है, तो स्वतंत्र धार्मिक प्रबंधन व्यवस्था इस दिशा में एक कारगर विकल्प सिद्ध हो सकती है। — पं. राधेश्याम उपाध्याय कारसेवक एवं पूर्व अध्यक्ष, कर्मकाण्डीय विप्र पुजारी परिषद, नीमच |