• देश : एकलव्य सैलाना में आखिर बार-बार क्यों सुलग रहा असंतोष? पहले शिकायतें, फिर धरने, छात्रा की मौत के बाद मजिस्ट्रियल जांच और अब 20 किलोमीटर पैदल चलकर कलेक्ट्रेट पहुंचे विद्यार्थी; कॉमर्स-इकोनॉमिक्स के शिक्षक नहीं, वॉशरूम बदहाल होने के आरोप.... विधायक कमलेश्वर डोडियार ने विद्यालय पहुंचकर ली बैठक, अधिकारियों को तत्काल निराकरण के निर्देश; सवाल—बच्चों के भविष्य की जिम्मेदारी आखिर किसकी?....

    JITENDRA KUMAWAT   - रतलाम
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    देश   - रतलाम[27-10-2026]

  • रतलाम/सैलाना। आदिवासी अंचल के बच्चों को बेहतर शिक्षा, सुरक्षित आवास और उज्ज्वल भविष्य देने के उद्देश्य से संचालित एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय सैलाना इन दिनों गंभीर सवालों के घेरे में है। यहां कभी छात्रावास की व्यवस्थाओं को लेकर विद्यार्थी आवाज उठाते हैं, कभी भोजन और अन्य सुविधाओं को लेकर धरने पर बैठते हैं, फिर कक्षा 12वीं की छात्रा वर्षा सोलंकी की मौत के बाद परिसर में उग्र विरोध की स्थिति बनती है और अब 26 अक्टूबर 2026 को विद्यार्थी अपनी समस्याएं लेकर करीब 20 किलोमीटर पैदल चलकर रतलाम कलेक्ट्रेट पहुंच जाते हैं।

    यह घटनाक्रम महज एक दिन का विरोध प्रदर्शन नहीं है। यह विद्यालय की व्यवस्थाओं, शिकायतों के निराकरण, विद्यार्थियों और प्रबंधन के बीच संवाद तथा जिम्मेदार अधिकारियों की निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े करता है। सवाल यह भी है कि आखिर एकलव्य सैलाना में ही बार-बार ऐसी स्थिति क्यों बन रही है? क्या विद्यार्थियों की समस्याओं को समय रहते गंभीरता से नहीं सुना जा रहा है, क्या विद्यालय प्रबंधन अपनी जिम्मेदारियां प्रभावी ढंग से निभा पा रहा है या फिर विद्यार्थियों और शिक्षकों के बीच ऐसा संवादहीनता का माहौल बन गया है, जिसमें समस्याओं का समाधान बातचीत के बजाय आंदोलन से तलाशा जा रहा है?

    इन सवालों के जवाब तलाशना अब जरूरी हो गया है।

    शिकायतों से शुरू हुआ सिलसिला, धरनों तक पहुंचा विवाद

    एकलव्य विद्यालय परिसर में विद्यार्थियों की नाराजगी पहली बार सामने नहीं आई है। उपलब्ध घटनाक्रम के अनुसार, 13 दिसंबर 2024 को छात्रावास की व्यवस्थाओं को लेकर छात्राओं ने विरोध जताया था। बाद में विद्यार्थियों ने विभिन्न समस्याओं और मांगों को लेकर सैलाना विधायक कमलेश्वर डोडियार के साथ विद्यालय के मुख्य द्वार पर करीब तीन घंटे तक धरना दिया था। उस समय विद्यार्थियों का कहना था कि उनकी समस्याओं का समाधान नहीं हो रहा है। नाराज विद्यार्थियों ने पैदल रतलाम जाने तक की बात कही थी।

    इसके बाद भोजन व्यवस्था और ट्रैक सूट को लेकर भी असंतोष सामने आया। 26 जनवरी को विद्यार्थियों ने एक बार फिर विरोध प्रदर्शन किया। सूचना मिलने पर जिला पंचायत एवं जिला शिक्षा समिति अध्यक्ष केशुराम निनामा, विधायक प्रतिनिधि विक्रम चरेल और प्रशासनिक अधिकारी मौके पर पहुंचे थे।

    तत्कालीन एसडीएम मनीष जैन, एसडीओपी नीलम बघेल, जनजातीय कार्य विभाग की सहायक संचालक प्रीति जैन, तहसीलदार कैलाश कनोज और पुलिस अधिकारियों ने विद्यार्थियों से बातचीत कर समस्याएं सुनी थीं तथा समाधान का आश्वासन दिया था।

    उस समय भी सवाल यही था कि जब समस्याएं सामने आ रही हैं और अधिकारी मौके पर पहुंचकर विद्यार्थियों से चर्चा कर रहे हैं, तो फिर असंतोष दोबारा क्यों उभर रहा है? क्या पहले उठाई गई मांगों पर कार्रवाई की नियमित समीक्षा हुई? किन समस्याओं का निराकरण हुआ और किनका नहीं? इसका स्पष्ट जवाब सामने आना चाहिए।

    15 सितंबर को छात्रा वर्षा की मौत ने बढ़ाई गंभीरता

    15 सितंबर 2026 को कक्षा 12वीं की छात्रा वर्षा सोलंकी की मौत ने पूरे घटनाक्रम को बेहद संवेदनशील मोड़ पर पहुंचा दिया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वर्षा पिता टीकाराम सोलंकी, निवासी मेवाड़ पंथ, जिला देवास, छमाही परीक्षा देने पहुंची थी। परीक्षा के दौरान उसके पास कथित रूप से नकल की पर्ची मिलने की बात सामने आई। इसके बाद उसे परीक्षा कक्ष से बाहर रहने को कहा गया और वह छात्रावास स्थित अपने कमरे में चली गई।

    कुछ समय बाद उसकी रूम पार्टनर लक्षिता और प्रतिभा ने उसे फंदे पर लटका देखा। छात्राओं ने उसे नीचे उतारा, लेकिन उसकी मौत हो चुकी थी।
    घटना के बाद बड़ी संख्या में विद्यार्थी एकत्रित हुए। विद्यार्थियों ने विद्यालय के प्राचार्य नरेंद्र गंगवाल, वार्डन रेखा पारगी और शिक्षिका प्रीति लांबा के संबंध में कार्रवाई की मांग उठाई। मृतका के परिजनों को सहायता देने की मांग के साथ विरोध प्रदर्शन हुआ और सैलाना-रतलाम मुख्य मार्ग भी प्रभावित हुआ।

    उस समय जिला पंचायत उपाध्यक्ष केशुराम निनामा ने अधिकारियों से चर्चा की थी। कलेक्टर से बातचीत के बाद प्राचार्य को हटाने तथा संबंधित कर्मचारियों के संबंध में कार्रवाई का आश्वासन दिए जाने की जानकारी सामने आई थी। मृतका के परिजनों को पांच लाख रुपये की सहायता दस दिन में देने का आश्वासन मिलने के बाद विरोध समाप्त हुआ था।

    महत्वपूर्ण बात यह है कि वर्षा की मौत का वास्तविक कारण क्या था, इसकी पुष्टि जांच और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही की जा सकती है। परीक्षा के दौरान हुई कार्रवाई और मौत के बीच संबंध को जांच से पहले  मानना उचित नहीं होगा। लेकिन घटना के बाद उठे सवालों को नजरअंदाज करना भी संभव नहीं है।

    मजिस्ट्रियल जांच के आदेश, एसडीएम को 15 दिन में रिपोर्ट देनी है

    छात्रा की मौत के मामले में कलेक्टर अजय कटेसरिया ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 196 के तहत मजिस्ट्रियल जांच के आदेश जारी किए। जांच की जिम्मेदारी सैलाना एसडीएम सुनील जायसवाल को सौंपी गई और 15 दिनों के भीतर स्पष्ट अभिमत सहित जांच प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए।
    जांच के दायरे में घटना से जुड़े तथ्यों, परीक्षा के दौरान की परिस्थितियों, छात्रावास की निगरानी और संबंधित जिम्मेदारियों जैसे पहलुओं की पड़ताल महत्वपूर्ण है।

    यह जांच केवल एक दुखद घटना की परिस्थितियों को समझने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। विद्यालय में पहले से सामने आती रही शिकायतों और व्यवस्थागत समस्याओं की समीक्षा भी जरूरी है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि विद्यार्थियों की सुरक्षा, संवाद और शिकायत निवारण के लिए कौन-सी व्यवस्थाएं प्रभावी थीं और कहां सुधार की जरूरत है।

    अब 26 अक्टूबर को सामने आया नया घटनाक्रम इस सवाल को और गंभीर बना रहा है कि क्या पिछली घटनाओं से संस्थान और प्रशासन ने पर्याप्त सबक लिया?

    अब 20 किलोमीटर पैदल चलकर कलेक्ट्रेट पहुंचे विद्यार्थी

    26 अक्टूबर को एक बार फिर एकलव्य विद्यालय सैलाना की व्यवस्थाओं को लेकर असंतोष सामने आया। इस बार दर्जनों विद्यार्थी सुबह करीब 10 बजे विद्यालय से निकले और लगभग 20 किलोमीटर पैदल चलकर रतलाम कलेक्ट्रेट पहुंच गए। उनका उद्देश्य अपनी समस्याएं जिला प्रशासन के सामने रखना था।

    रास्ते में अधिकारियों ने विद्यार्थियों को रोकने और समझाने का प्रयास किया। विद्यार्थियों को बताया गया कि कलेक्टर अजय कटेसरिया छुट्टी पर हैं, लेकिन विद्यार्थी अपनी बात कलेक्टर तक पहुंचाने की मांग पर अड़े रहे।

    विद्यार्थियों के कलेक्ट्रेट पहुंचने की सूचना मिलते ही बाजना तहसीलदार कुलभूषण शर्मा, सैलाना एसडीएम सुनील जायसवाल, जनजातीय कार्य विभाग की सहायक आयुक्त प्रियंका राय और नायब तहसीलदार आशीष उपाध्याय सहित अन्य अधिकारी मौके पर पहुंचे।

    कलेक्ट्रेट परिसर में जमीन पर बैठे विद्यार्थियों से बातचीत करते हुए बाजना तहसीलदार कुलभूषण शर्मा ने कहा, अब तो बता दो क्या समस्या है? क्यों इतना परेशान होकर यहां तक आए हो? जो बात है हमें बताओ।
    विद्यार्थियों ने इसके बाद विद्यालय की व्यवस्थाओं से जुड़ी अपनी शिकायतें अधिकारियों के सामने रखीं। उनके आरोपों ने एक बार फिर विद्यालय में शिक्षा और मूलभूत सुविधाओं की स्थिति पर सवाल खड़े कर दिए।

    कॉमर्स और अर्थशास्त्र के शिक्षक नहीं होने का आरोप

    विद्यार्थियों की सबसे गंभीर शिकायत पढ़ाई से जुड़ी है। उनका कहना है कि विद्यालय को सीबीएसई पैटर्न पर संचालित बताया जाता है, लेकिन कॉमर्स और अर्थशास्त्र जैसे महत्वपूर्ण विषयों को पढ़ाने के लिए शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं।

    यदि विद्यार्थियों की यह शिकायत सही है, तो यह केवल स्टाफ की कमी का मामला नहीं है। यह सीधे उनके शैक्षणिक भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। बारहवीं कक्षा जैसे महत्वपूर्ण पड़ाव पर विषय विशेषज्ञ शिक्षकों की अनुपलब्धता विद्यार्थियों की तैयारी और परीक्षा परिणामों को प्रभावित कर सकती है।

    ऐसे में जनजातीय कार्य विभाग और विद्यालय प्रबंधन को स्पष्ट करना चाहिए कि स्वीकृत पद कितने हैं, विषयवार कितने शिक्षक कार्यरत हैं, कौन-से पद रिक्त हैं और शिक्षकों की कमी दूर करने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं।

    सीबीएसई पैटर्न का नाम विद्यार्थियों और अभिभावकों को बेहतर शैक्षणिक सुविधाओं की उम्मीद देता है। ऐसे में वास्तविक शैक्षणिक व्यवस्था और उपलब्ध संसाधनों के बीच अंतर होने की शिकायत का तथ्यात्मक परीक्षण जरूरी है।

    सवाल सीधा है—जब विद्यार्थी पढ़ने के लिए आवासीय विद्यालय में आए हैं, तो उन्हें अपने ही विषयों के शिक्षकों के लिए आवाज क्यों उठानी पड़ रही है?

    वॉशरूम की गंदगी और सफाई व्यवस्था पर भी सवाल

    विद्यार्थियों ने छात्रावास और विद्यालय के वॉशरूम की सफाई को लेकर भी गंभीर शिकायतें कीं। उनका आरोप है कि शौचालयों में गंदगी और दुर्गंध के कारण उनका उपयोग करना तक मुश्किल हो जाता है।

    यदि यह स्थिति वास्तविक है, तो यह केवल सफाई कर्मचारियों की जिम्मेदारी का प्रश्न नहीं है। छात्रावास में स्वच्छता बनाए रखना, नियमित निरीक्षण करना, पेयजल और साफ-सफाई की व्यवस्था सुनिश्चित करना विद्यालय प्रबंधन की भी जिम्मेदारी है।

    विद्यार्थियों ने भोजन, पेयजल और छात्रावास की दूसरी मूलभूत सुविधाओं से जुड़ी समस्याएं भी विधायक कमलेश्वर डोडियार के समक्ष रखीं। इन शिकायतों की वास्तविक स्थिति जानने के लिए विद्यालय परिसर का निष्पक्ष निरीक्षण और कमियों का लिखित आकलन आवश्यक है।

    आवासीय विद्यालय में रहने वाले बच्चे दिन-रात उसी परिसर में रहते हैं। ऐसे में साफ-सफाई, भोजन, पानी और स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएं कोई अतिरिक्त मांग नहीं, बल्कि बुनियादी जरूरतें हैं।

    सिर्फ आश्वासन या समस्याओं का स्थायी समाधान?

    विद्यार्थियों का आरोप है कि वे पहले भी जिम्मेदारों के सामने अपनी समस्याएं रख चुके हैं। उन्हें हर बार समस्या का समाधान कराने का आश्वासन मिलता है, लेकिन जमीनी स्थिति में अपेक्षित बदलाव नहीं दिखाई देता।

    यह आरोप जांच और प्रशासनिक समीक्षा का विषय है। लेकिन यदि बार-बार शिकायतें सामने आती हैं, तो प्रशासन को यह पता लगाना ही होगा कि उनका निराकरण क्यों नहीं हो पा रहा है।
    किस अधिकारी को कौन-सी शिकायत दी गई? उस पर क्या कार्रवाई हुई? विद्यालय का अंतिम निरीक्षण कब किया गया? शिक्षकों की कमी और स्वच्छता जैसी समस्याओं के समाधान के लिए समयसीमा तय हुई या नहीं? विद्यार्थियों से दोबारा फीडबैक लिया गया या नहीं?

    इन सवालों का जवाब केवल मौखिक आश्वासनों से नहीं, बल्कि लिखित कार्रवाई, निरीक्षण रिपोर्ट और तय समयसीमा में हुए सुधार से मिलना चाहिए।

    कलेक्ट्रेट में मौजूद शिक्षिका की चुप्पी से नहीं मिलेगा जवाब

    कलेक्ट्रेट परिसर में मौजूद विद्यालय की जिम्मेदार शिक्षिका ज्योति से जब मौके पर मौजूद लोगों और मीडिया ने विद्यार्थियों की शिकायतों के संबंध में जवाब जानना चाहा, तो वे असहज दिखाई दीं। उपलब्ध घटनाक्रम के अनुसार, उनका पक्ष स्पष्ट रूप से सामने नहीं आ सका।

    हालांकि किसी एक शिक्षिका की मौके पर प्रतिक्रिया को पूरे विद्यालय की नाकामी का प्रमाण नहीं माना जा सकता। विद्यार्थियों की शिकायतों पर विद्यालय प्रबंधन और संबंधित विभाग का आधिकारिक पक्ष भी सामने आना चाहिए।

    लेकिन यह जरूर पूछा जाना चाहिए कि जब विद्यार्थी अपनी मूलभूत समस्याओं को लेकर जिला मुख्यालय तक पहुंच रहे हैं, तो विद्यालय स्तर पर शिकायत सुनने और उनका समाधान करने की व्यवस्था कितनी प्रभावी है?
    जिम्मेदारों की चुप्पी या अस्पष्ट जवाब समस्याओं का समाधान नहीं कर सकते। विद्यार्थियों को जवाब चाहिए, और प्रशासन को तथ्यों के आधार पर जवाबदेही तय करनी चाहिए।

    विधायक कमलेश्वर डोडियार पहुंचे विद्यालय, अधिकारियों से की चर्चा

    विद्यार्थियों के पैदल रतलाम पहुंचने की सूचना मिलने पर सैलाना विधायक कमलेश्वर डोडियार भी सक्रिय हुए। उन्होंने एकलव्य मॉडल रेजिडेंशियल स्कूल पहुंचकर विद्यार्थियों, जनजातीय कार्य विभाग की सहायक आयुक्त प्रियंका राय, विद्यालय के प्राचार्य और छात्रावास वार्डनों के साथ बैठक की।

    विधायक के समक्ष विद्यार्थियों ने छात्रावास, भोजन, पेयजल, साफ-सफाई और अन्य आवश्यक सुविधाओं से जुड़ी शिकायतें रखीं। विधायक ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि विद्यार्थियों की समस्याओं की अनदेखी बर्दाश्त नहीं की जाएगी और उनका तत्काल निराकरण सुनिश्चित किया जाए।

    उन्होंने रतलाम कलेक्टर अजय कटेसरिया और उज्जैन संभाग के जनजातीय कार्य विभाग के उपायुक्त से दूरभाष पर चर्चा कर पूरे मामले से अवगत कराया। साथ ही विद्यालय का शीघ्र निरीक्षण करने, आवश्यक कार्रवाई करने और विद्यार्थियों को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने का आग्रह किया।

    विधायक कमलेश्वर डोडियार ने कहा कि आदिवासी विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के साथ सुरक्षित और सम्मानजनक छात्रावासीय वातावरण उपलब्ध कराना सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है। व्यवस्थाओं में लापरवाही सामने आने पर संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय कर कार्रवाई की मांग की जाएगी।

    उन्होंने विद्यार्थियों को भरोसा दिलाया कि उनकी समस्याओं के समाधान के लिए प्रशासन के साथ लगातार समन्वय किया जाएगा और ऐसी स्थिति नहीं आनी चाहिए कि बच्चों को अपनी बात रखने के लिए लंबी दूरी पैदल तय करनी पड़े।

    विधायक की पहल के बाद अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विद्यार्थियों की शिकायतों पर तत्काल क्या कार्रवाई होती है और क्या इस बार समस्याओं का स्थायी समाधान सुनिश्चित किया जाता है।

    सबसे बड़ा सवाल: आखिर एकलव्य सैलाना में ही बार-बार क्यों बनती है ऐसी स्थिति?

    यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण है। शिकायतें सामने आती हैं, विद्यार्थी विरोध करते हैं, अधिकारी पहुंचते हैं, बातचीत होती है, आश्वासन दिए जाते हैं और कुछ समय बाद फिर असंतोष सामने आ जाता है। इस पूरी कड़ी में कहीं न कहीं शिकायत निवारण और निगरानी की व्यवस्था की समीक्षा जरूरी दिखाई देती है।

    क्या विद्यालय में विद्यार्थियों की समस्याएं सुनने के लिए नियमित बैठक होती है? क्या छात्रावासों का औचक निरीक्षण किया जाता है? क्या विद्यार्थियों को अपनी शिकायत बिना किसी भय या दबाव के रखने का अवसर मिलता है? क्या हर शिकायत पर कार्रवाई की समयसीमा निर्धारित होती है? और क्या अधिकारियों को यह जानकारी रहती है कि पिछली शिकायतों का वास्तव में समाधान हुआ या नहीं?

    इन सवालों का जवाब प्रशासन को देना चाहिए।

    साथ ही, यह भी स्पष्ट रहना चाहिए कि किसी विद्यालय में विरोध होना अपने आप में प्रत्येक शिकायत को सही साबित नहीं करता। विद्यार्थियों की हर मांग का तथ्यात्मक परीक्षण होना चाहिए और विद्यालय प्रबंधन का पक्ष भी सुना जाना चाहिए। लेकिन यदि शिकायतें बार-बार सामने आ रही हैं, तो उन्हें केवल अनुशासनहीनता कहकर खारिज करना भी उचित नहीं होगा।

    विद्यार्थियों की बात सुनना और अनुशासन बनाए रखना एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। दोनों जिम्मेदारियां साथ निभानी होंगी।

    क्या बच्चों में संयम की कमी है या व्यवस्था संवाद में विफल हो रही है?

    इस घटनाक्रम का एक दूसरा पहलू भी है। विद्यार्थियों का अपनी समस्याओं को लेकर आवाज उठाना उनका अधिकार है, लेकिन 20 किलोमीटर पैदल चलकर जिला मुख्यालय पहुंचने जैसी स्थिति यह सोचने पर मजबूर करती है कि विद्यालय स्तर पर संवाद की व्यवस्था कितनी कारगर है।

    बच्चों को अपनी बात संयम, अनुशासन और लोकतांत्रिक तरीके से रखने की शिक्षा मिलनी चाहिए। परीक्षा के दौरान नियमों का पालन करना, शिक्षकों के निर्देशों का सम्मान करना और विद्यालय की व्यवस्था बनाए रखना भी विद्यार्थियों की जिम्मेदारी है।

    लेकिन अनुशासन का अर्थ यह नहीं हो सकता कि विद्यार्थियों की वास्तविक समस्याओं को सुना ही न जाए। यदि किसी विद्यार्थी को लगता है कि उसकी शिकायत पर कार्रवाई नहीं हो रही, तो उसे अपनी बात रखने के लिए विश्वसनीय व्यवस्था मिलनी चाहिए। ऐसी व्यवस्था नहीं होने पर नाराजगी बढ़ सकती है और विरोध का रूप ले सकती है।

    दूसरी ओर, शिक्षकों और वार्डनों पर भी पढ़ाई, अनुशासन, छात्रावास प्रबंधन और बच्चों की सुरक्षा जैसी अनेक जिम्मेदारियां होती हैं। यदि स्टाफ की कमी, संसाधनों का अभाव या प्रशासनिक दबाव है, तो उस स्थिति की भी निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए। हालांकि ऐसी किसी कठिनाई के आधार पर बुनियादी सुविधाओं की कमी या शिकायतों की अनदेखी को उचित नहीं ठहराया जा सकता।

    इसलिए जांच केवल यह पता लगाने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए कि विद्यार्थी विरोध क्यों कर रहे हैं। यह भी देखना होगा कि विद्यालय में ऐसा माहौल बनाने के लिए क्या किया गया, जहां बच्चों को अपनी समस्या रखने के लिए बार-बार आंदोलन का रास्ता चुनना पड़ रहा है।

    कलेक्टर और जनजातीय कार्य विभाग के सामने अब जवाबदेही की परीक्षा

    कलेक्टर अजय कटेसरिया, सैलाना एसडीएम सुनील जायसवाल और जनजातीय कार्य विभाग की सहायक आयुक्त प्रियंका राय सहित संबंधित अधिकारियों के सामने अब चुनौती केवल विद्यार्थियों को समझाकर वापस भेजने की नहीं है। वास्तविक चुनौती उन कारणों की पहचान करना है, जिनके चलते विद्यालय में बार-बार असंतोष सामने आ रहा है।

    इस मामले में कुछ कदम तत्काल उठाए जाने चाहिए—

    विद्यालय में विषयवार शिक्षकों की उपलब्धता और रिक्त पदों की स्थिति सार्वजनिक की जाए।

    छात्रावास, वॉशरूम, पेयजल और भोजन व्यवस्था का संयुक्त निरीक्षण कर कमियों की सूची तैयार की जाए।

    पूर्व में विद्यार्थियों द्वारा उठाई गई शिकायतों और उन पर हुई कार्रवाई का रिकॉर्ड जांचा जाए।

    छात्र-छात्राओं से अलग-अलग बातचीत कर उनकी समस्याएं सुनी जाएं, ताकि वे बिना दबाव के अपनी बात रख सकें।

    छात्रावासों में निगरानी, शिकायत निवारण और विद्यार्थियों के मानसिक एवं भावनात्मक सहयोग की व्यवस्था की समीक्षा हो।

    प्रत्येक कमी को दूर करने के लिए जिम्मेदार अधिकारी और समयसीमा तय की जाए तथा बाद में अनुपालन की जांच हो।

    इन कदमों से ही पता चलेगा कि प्रशासन समस्या की जड़ तक पहुंचना चाहता है या मामला शांत होने के बाद फिर पुरानी स्थिति लौट आएगी।

    वर्षा की मौत के बाद उठे सवालों से भी लिया जाए सबक

    15 सितंबर को वर्षा सोलंकी की मौत के बाद मजिस्ट्रियल जांच के आदेश दिए गए थे। उस घटना के वास्तविक कारण और जिम्मेदारी का निर्धारण जांच के निष्कर्षों तथा उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही किया जाना चाहिए। वर्षा की मौत को वर्तमान विरोध का निश्चित कारण मानना भी उचित नहीं होगा।

    फिर भी, एक ही परिसर में छात्रावास की व्यवस्थाओं को लेकर पहले विरोध, फिर छात्रा की मौत के बाद तनाव और अब बुनियादी सुविधाओं की शिकायतों के साथ विद्यार्थियों का जिला मुख्यालय पहुंचना—इन घटनाओं को पूरी तरह अलग-अलग करके देखना भी पर्याप्त नहीं होगा।

    प्रशासन को यह समझना होगा कि आवासीय विद्यालयों में बच्चों की जिम्मेदारी केवल कक्षा में पढ़ाने तक सीमित नहीं है। बच्चे परिवार से दूर रहते हैं। उन्हें पढ़ाई, भोजन, स्वच्छता, सुरक्षा और भावनात्मक सहयोग की जरूरत होती है। उनकी समस्याओं को समय रहते सुनना और उनका समाधान करना संस्थान की कार्यप्रणाली का अनिवार्य हिस्सा होना चाहिए।

    अब आश्वासन नहीं, परिणाम चाहिए

    एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय सैलाना में बार-बार उठ रहे सवालों का समाधान किसी एक बैठक, एक निरीक्षण या एक दिन के विरोध को समाप्त करने से नहीं होगा। इसके लिए विद्यालय की पूरी व्यवस्था की निष्पक्ष समीक्षा करनी होगी।

    यदि शिक्षकों की कमी है तो उसे दूर करना होगा। यदि सफाई व्यवस्था खराब है तो जिम्मेदारी तय करनी होगी। यदि विद्यार्थियों की शिकायतों पर कार्रवाई नहीं होती तो शिकायत निवारण की प्रक्रिया बदलनी होगी। यदि अनुशासन संबंधी समस्याएं हैं तो उनके समाधान के लिए संवाद, परामर्श और स्पष्ट नियमों की व्यवस्था करनी होगी।

    और यदि विद्यालय प्रबंधन या संबंधित अधिकारियों की लापरवाही प्रमाणित होती है, तो नियमानुसार कार्रवाई भी होनी चाहिए।

    सबसे बड़ा सवाल यही है—आदिवासी बच्चों को बेहतर भविष्य देने के लिए बने एकलव्य विद्यालय में आखिर बच्चों को अपनी बुनियादी समस्याएं सुनाने के लिए 20 किलोमीटर पैदल चलकर कलेक्ट्रेट क्यों पहुंचना पड़ा?

    इस सवाल का जवाब किसी एक विद्यार्थी, शिक्षक या अधिकारी पर आरोप लगाकर नहीं मिलेगा। जवाब मिलेगा तथ्यों की जांच, जिम्मेदारियों के निर्धारण और व्यवस्था में वास्तविक सुधार से।

    क्योंकि एकलव्य विद्यालय का उद्देश्य केवल बच्चों को परीक्षा में सफल बनाना नहीं, बल्कि उन्हें सुरक्षित वातावरण, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सम्मानजनक जीवन का अवसर देना है। अब समय है कि इस उद्देश्य को कागजों और आश्वासनों से निकालकर धरातल पर उतारा जाए।

    रिपोर्टर जितेन्द्र कुमावत







  • देश : एकलव्य सैलाना में आखिर बार-बार क्यों सुलग रहा असंतोष? पहले शिकायतें, फिर धरने, छात्रा की मौत के बाद मजिस्ट्रियल जांच और अब 20 किलोमीटर पैदल चलकर कलेक्ट्रेट पहुंचे विद्यार्थी; कॉमर्स-इकोनॉमिक्स के शिक्षक नहीं, वॉशरूम बदहाल होने के आरोप.... विधायक कमलेश्वर डोडियार ने विद्यालय पहुंचकर ली बैठक, अधिकारियों को तत्काल निराकरण के निर्देश; सवाल—बच्चों के भविष्य की जिम्मेदारी आखिर किसकी?....

    JITENDRA KUMAWAT   - रतलाम
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    रतलाम/सैलाना। आदिवासी अंचल के बच्चों को बेहतर शिक्षा, सुरक्षित आवास और उज्ज्वल भविष्य देने के उद्देश्य से संचालित एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय सैलाना इन दिनों गंभीर सवालों के घेरे में है। यहां कभी छात्रावास की व्यवस्थाओं को लेकर विद्यार्थी आवाज उठाते हैं, कभी भोजन और अन्य सुविधाओं को लेकर धरने पर बैठते हैं, फिर कक्षा 12वीं की छात्रा वर्षा सोलंकी की मौत के बाद परिसर में उग्र विरोध की स्थिति बनती है और अब 26 अक्टूबर 2026 को विद्यार्थी अपनी समस्याएं लेकर करीब 20 किलोमीटर पैदल चलकर रतलाम कलेक्ट्रेट पहुंच जाते हैं।

    यह घटनाक्रम महज एक दिन का विरोध प्रदर्शन नहीं है। यह विद्यालय की व्यवस्थाओं, शिकायतों के निराकरण, विद्यार्थियों और प्रबंधन के बीच संवाद तथा जिम्मेदार अधिकारियों की निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े करता है। सवाल यह भी है कि आखिर एकलव्य सैलाना में ही बार-बार ऐसी स्थिति क्यों बन रही है? क्या विद्यार्थियों की समस्याओं को समय रहते गंभीरता से नहीं सुना जा रहा है, क्या विद्यालय प्रबंधन अपनी जिम्मेदारियां प्रभावी ढंग से निभा पा रहा है या फिर विद्यार्थियों और शिक्षकों के बीच ऐसा संवादहीनता का माहौल बन गया है, जिसमें समस्याओं का समाधान बातचीत के बजाय आंदोलन से तलाशा जा रहा है?

    इन सवालों के जवाब तलाशना अब जरूरी हो गया है।

    शिकायतों से शुरू हुआ सिलसिला, धरनों तक पहुंचा विवाद

    एकलव्य विद्यालय परिसर में विद्यार्थियों की नाराजगी पहली बार सामने नहीं आई है। उपलब्ध घटनाक्रम के अनुसार, 13 दिसंबर 2024 को छात्रावास की व्यवस्थाओं को लेकर छात्राओं ने विरोध जताया था। बाद में विद्यार्थियों ने विभिन्न समस्याओं और मांगों को लेकर सैलाना विधायक कमलेश्वर डोडियार के साथ विद्यालय के मुख्य द्वार पर करीब तीन घंटे तक धरना दिया था। उस समय विद्यार्थियों का कहना था कि उनकी समस्याओं का समाधान नहीं हो रहा है। नाराज विद्यार्थियों ने पैदल रतलाम जाने तक की बात कही थी।

    इसके बाद भोजन व्यवस्था और ट्रैक सूट को लेकर भी असंतोष सामने आया। 26 जनवरी को विद्यार्थियों ने एक बार फिर विरोध प्रदर्शन किया। सूचना मिलने पर जिला पंचायत एवं जिला शिक्षा समिति अध्यक्ष केशुराम निनामा, विधायक प्रतिनिधि विक्रम चरेल और प्रशासनिक अधिकारी मौके पर पहुंचे थे।

    तत्कालीन एसडीएम मनीष जैन, एसडीओपी नीलम बघेल, जनजातीय कार्य विभाग की सहायक संचालक प्रीति जैन, तहसीलदार कैलाश कनोज और पुलिस अधिकारियों ने विद्यार्थियों से बातचीत कर समस्याएं सुनी थीं तथा समाधान का आश्वासन दिया था।

    उस समय भी सवाल यही था कि जब समस्याएं सामने आ रही हैं और अधिकारी मौके पर पहुंचकर विद्यार्थियों से चर्चा कर रहे हैं, तो फिर असंतोष दोबारा क्यों उभर रहा है? क्या पहले उठाई गई मांगों पर कार्रवाई की नियमित समीक्षा हुई? किन समस्याओं का निराकरण हुआ और किनका नहीं? इसका स्पष्ट जवाब सामने आना चाहिए।

    15 सितंबर को छात्रा वर्षा की मौत ने बढ़ाई गंभीरता

    15 सितंबर 2026 को कक्षा 12वीं की छात्रा वर्षा सोलंकी की मौत ने पूरे घटनाक्रम को बेहद संवेदनशील मोड़ पर पहुंचा दिया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वर्षा पिता टीकाराम सोलंकी, निवासी मेवाड़ पंथ, जिला देवास, छमाही परीक्षा देने पहुंची थी। परीक्षा के दौरान उसके पास कथित रूप से नकल की पर्ची मिलने की बात सामने आई। इसके बाद उसे परीक्षा कक्ष से बाहर रहने को कहा गया और वह छात्रावास स्थित अपने कमरे में चली गई।

    कुछ समय बाद उसकी रूम पार्टनर लक्षिता और प्रतिभा ने उसे फंदे पर लटका देखा। छात्राओं ने उसे नीचे उतारा, लेकिन उसकी मौत हो चुकी थी।
    घटना के बाद बड़ी संख्या में विद्यार्थी एकत्रित हुए। विद्यार्थियों ने विद्यालय के प्राचार्य नरेंद्र गंगवाल, वार्डन रेखा पारगी और शिक्षिका प्रीति लांबा के संबंध में कार्रवाई की मांग उठाई। मृतका के परिजनों को सहायता देने की मांग के साथ विरोध प्रदर्शन हुआ और सैलाना-रतलाम मुख्य मार्ग भी प्रभावित हुआ।

    उस समय जिला पंचायत उपाध्यक्ष केशुराम निनामा ने अधिकारियों से चर्चा की थी। कलेक्टर से बातचीत के बाद प्राचार्य को हटाने तथा संबंधित कर्मचारियों के संबंध में कार्रवाई का आश्वासन दिए जाने की जानकारी सामने आई थी। मृतका के परिजनों को पांच लाख रुपये की सहायता दस दिन में देने का आश्वासन मिलने के बाद विरोध समाप्त हुआ था।

    महत्वपूर्ण बात यह है कि वर्षा की मौत का वास्तविक कारण क्या था, इसकी पुष्टि जांच और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही की जा सकती है। परीक्षा के दौरान हुई कार्रवाई और मौत के बीच संबंध को जांच से पहले  मानना उचित नहीं होगा। लेकिन घटना के बाद उठे सवालों को नजरअंदाज करना भी संभव नहीं है।

    मजिस्ट्रियल जांच के आदेश, एसडीएम को 15 दिन में रिपोर्ट देनी है

    छात्रा की मौत के मामले में कलेक्टर अजय कटेसरिया ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 196 के तहत मजिस्ट्रियल जांच के आदेश जारी किए। जांच की जिम्मेदारी सैलाना एसडीएम सुनील जायसवाल को सौंपी गई और 15 दिनों के भीतर स्पष्ट अभिमत सहित जांच प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए।
    जांच के दायरे में घटना से जुड़े तथ्यों, परीक्षा के दौरान की परिस्थितियों, छात्रावास की निगरानी और संबंधित जिम्मेदारियों जैसे पहलुओं की पड़ताल महत्वपूर्ण है।

    यह जांच केवल एक दुखद घटना की परिस्थितियों को समझने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। विद्यालय में पहले से सामने आती रही शिकायतों और व्यवस्थागत समस्याओं की समीक्षा भी जरूरी है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि विद्यार्थियों की सुरक्षा, संवाद और शिकायत निवारण के लिए कौन-सी व्यवस्थाएं प्रभावी थीं और कहां सुधार की जरूरत है।

    अब 26 अक्टूबर को सामने आया नया घटनाक्रम इस सवाल को और गंभीर बना रहा है कि क्या पिछली घटनाओं से संस्थान और प्रशासन ने पर्याप्त सबक लिया?

    अब 20 किलोमीटर पैदल चलकर कलेक्ट्रेट पहुंचे विद्यार्थी

    26 अक्टूबर को एक बार फिर एकलव्य विद्यालय सैलाना की व्यवस्थाओं को लेकर असंतोष सामने आया। इस बार दर्जनों विद्यार्थी सुबह करीब 10 बजे विद्यालय से निकले और लगभग 20 किलोमीटर पैदल चलकर रतलाम कलेक्ट्रेट पहुंच गए। उनका उद्देश्य अपनी समस्याएं जिला प्रशासन के सामने रखना था।

    रास्ते में अधिकारियों ने विद्यार्थियों को रोकने और समझाने का प्रयास किया। विद्यार्थियों को बताया गया कि कलेक्टर अजय कटेसरिया छुट्टी पर हैं, लेकिन विद्यार्थी अपनी बात कलेक्टर तक पहुंचाने की मांग पर अड़े रहे।

    विद्यार्थियों के कलेक्ट्रेट पहुंचने की सूचना मिलते ही बाजना तहसीलदार कुलभूषण शर्मा, सैलाना एसडीएम सुनील जायसवाल, जनजातीय कार्य विभाग की सहायक आयुक्त प्रियंका राय और नायब तहसीलदार आशीष उपाध्याय सहित अन्य अधिकारी मौके पर पहुंचे।

    कलेक्ट्रेट परिसर में जमीन पर बैठे विद्यार्थियों से बातचीत करते हुए बाजना तहसीलदार कुलभूषण शर्मा ने कहा, अब तो बता दो क्या समस्या है? क्यों इतना परेशान होकर यहां तक आए हो? जो बात है हमें बताओ।
    विद्यार्थियों ने इसके बाद विद्यालय की व्यवस्थाओं से जुड़ी अपनी शिकायतें अधिकारियों के सामने रखीं। उनके आरोपों ने एक बार फिर विद्यालय में शिक्षा और मूलभूत सुविधाओं की स्थिति पर सवाल खड़े कर दिए।

    कॉमर्स और अर्थशास्त्र के शिक्षक नहीं होने का आरोप

    विद्यार्थियों की सबसे गंभीर शिकायत पढ़ाई से जुड़ी है। उनका कहना है कि विद्यालय को सीबीएसई पैटर्न पर संचालित बताया जाता है, लेकिन कॉमर्स और अर्थशास्त्र जैसे महत्वपूर्ण विषयों को पढ़ाने के लिए शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं।

    यदि विद्यार्थियों की यह शिकायत सही है, तो यह केवल स्टाफ की कमी का मामला नहीं है। यह सीधे उनके शैक्षणिक भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। बारहवीं कक्षा जैसे महत्वपूर्ण पड़ाव पर विषय विशेषज्ञ शिक्षकों की अनुपलब्धता विद्यार्थियों की तैयारी और परीक्षा परिणामों को प्रभावित कर सकती है।

    ऐसे में जनजातीय कार्य विभाग और विद्यालय प्रबंधन को स्पष्ट करना चाहिए कि स्वीकृत पद कितने हैं, विषयवार कितने शिक्षक कार्यरत हैं, कौन-से पद रिक्त हैं और शिक्षकों की कमी दूर करने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं।

    सीबीएसई पैटर्न का नाम विद्यार्थियों और अभिभावकों को बेहतर शैक्षणिक सुविधाओं की उम्मीद देता है। ऐसे में वास्तविक शैक्षणिक व्यवस्था और उपलब्ध संसाधनों के बीच अंतर होने की शिकायत का तथ्यात्मक परीक्षण जरूरी है।

    सवाल सीधा है—जब विद्यार्थी पढ़ने के लिए आवासीय विद्यालय में आए हैं, तो उन्हें अपने ही विषयों के शिक्षकों के लिए आवाज क्यों उठानी पड़ रही है?

    वॉशरूम की गंदगी और सफाई व्यवस्था पर भी सवाल

    विद्यार्थियों ने छात्रावास और विद्यालय के वॉशरूम की सफाई को लेकर भी गंभीर शिकायतें कीं। उनका आरोप है कि शौचालयों में गंदगी और दुर्गंध के कारण उनका उपयोग करना तक मुश्किल हो जाता है।

    यदि यह स्थिति वास्तविक है, तो यह केवल सफाई कर्मचारियों की जिम्मेदारी का प्रश्न नहीं है। छात्रावास में स्वच्छता बनाए रखना, नियमित निरीक्षण करना, पेयजल और साफ-सफाई की व्यवस्था सुनिश्चित करना विद्यालय प्रबंधन की भी जिम्मेदारी है।

    विद्यार्थियों ने भोजन, पेयजल और छात्रावास की दूसरी मूलभूत सुविधाओं से जुड़ी समस्याएं भी विधायक कमलेश्वर डोडियार के समक्ष रखीं। इन शिकायतों की वास्तविक स्थिति जानने के लिए विद्यालय परिसर का निष्पक्ष निरीक्षण और कमियों का लिखित आकलन आवश्यक है।

    आवासीय विद्यालय में रहने वाले बच्चे दिन-रात उसी परिसर में रहते हैं। ऐसे में साफ-सफाई, भोजन, पानी और स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएं कोई अतिरिक्त मांग नहीं, बल्कि बुनियादी जरूरतें हैं।

    सिर्फ आश्वासन या समस्याओं का स्थायी समाधान?

    विद्यार्थियों का आरोप है कि वे पहले भी जिम्मेदारों के सामने अपनी समस्याएं रख चुके हैं। उन्हें हर बार समस्या का समाधान कराने का आश्वासन मिलता है, लेकिन जमीनी स्थिति में अपेक्षित बदलाव नहीं दिखाई देता।

    यह आरोप जांच और प्रशासनिक समीक्षा का विषय है। लेकिन यदि बार-बार शिकायतें सामने आती हैं, तो प्रशासन को यह पता लगाना ही होगा कि उनका निराकरण क्यों नहीं हो पा रहा है।
    किस अधिकारी को कौन-सी शिकायत दी गई? उस पर क्या कार्रवाई हुई? विद्यालय का अंतिम निरीक्षण कब किया गया? शिक्षकों की कमी और स्वच्छता जैसी समस्याओं के समाधान के लिए समयसीमा तय हुई या नहीं? विद्यार्थियों से दोबारा फीडबैक लिया गया या नहीं?

    इन सवालों का जवाब केवल मौखिक आश्वासनों से नहीं, बल्कि लिखित कार्रवाई, निरीक्षण रिपोर्ट और तय समयसीमा में हुए सुधार से मिलना चाहिए।

    कलेक्ट्रेट में मौजूद शिक्षिका की चुप्पी से नहीं मिलेगा जवाब

    कलेक्ट्रेट परिसर में मौजूद विद्यालय की जिम्मेदार शिक्षिका ज्योति से जब मौके पर मौजूद लोगों और मीडिया ने विद्यार्थियों की शिकायतों के संबंध में जवाब जानना चाहा, तो वे असहज दिखाई दीं। उपलब्ध घटनाक्रम के अनुसार, उनका पक्ष स्पष्ट रूप से सामने नहीं आ सका।

    हालांकि किसी एक शिक्षिका की मौके पर प्रतिक्रिया को पूरे विद्यालय की नाकामी का प्रमाण नहीं माना जा सकता। विद्यार्थियों की शिकायतों पर विद्यालय प्रबंधन और संबंधित विभाग का आधिकारिक पक्ष भी सामने आना चाहिए।

    लेकिन यह जरूर पूछा जाना चाहिए कि जब विद्यार्थी अपनी मूलभूत समस्याओं को लेकर जिला मुख्यालय तक पहुंच रहे हैं, तो विद्यालय स्तर पर शिकायत सुनने और उनका समाधान करने की व्यवस्था कितनी प्रभावी है?
    जिम्मेदारों की चुप्पी या अस्पष्ट जवाब समस्याओं का समाधान नहीं कर सकते। विद्यार्थियों को जवाब चाहिए, और प्रशासन को तथ्यों के आधार पर जवाबदेही तय करनी चाहिए।

    विधायक कमलेश्वर डोडियार पहुंचे विद्यालय, अधिकारियों से की चर्चा

    विद्यार्थियों के पैदल रतलाम पहुंचने की सूचना मिलने पर सैलाना विधायक कमलेश्वर डोडियार भी सक्रिय हुए। उन्होंने एकलव्य मॉडल रेजिडेंशियल स्कूल पहुंचकर विद्यार्थियों, जनजातीय कार्य विभाग की सहायक आयुक्त प्रियंका राय, विद्यालय के प्राचार्य और छात्रावास वार्डनों के साथ बैठक की।

    विधायक के समक्ष विद्यार्थियों ने छात्रावास, भोजन, पेयजल, साफ-सफाई और अन्य आवश्यक सुविधाओं से जुड़ी शिकायतें रखीं। विधायक ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि विद्यार्थियों की समस्याओं की अनदेखी बर्दाश्त नहीं की जाएगी और उनका तत्काल निराकरण सुनिश्चित किया जाए।

    उन्होंने रतलाम कलेक्टर अजय कटेसरिया और उज्जैन संभाग के जनजातीय कार्य विभाग के उपायुक्त से दूरभाष पर चर्चा कर पूरे मामले से अवगत कराया। साथ ही विद्यालय का शीघ्र निरीक्षण करने, आवश्यक कार्रवाई करने और विद्यार्थियों को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने का आग्रह किया।

    विधायक कमलेश्वर डोडियार ने कहा कि आदिवासी विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के साथ सुरक्षित और सम्मानजनक छात्रावासीय वातावरण उपलब्ध कराना सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है। व्यवस्थाओं में लापरवाही सामने आने पर संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय कर कार्रवाई की मांग की जाएगी।

    उन्होंने विद्यार्थियों को भरोसा दिलाया कि उनकी समस्याओं के समाधान के लिए प्रशासन के साथ लगातार समन्वय किया जाएगा और ऐसी स्थिति नहीं आनी चाहिए कि बच्चों को अपनी बात रखने के लिए लंबी दूरी पैदल तय करनी पड़े।

    विधायक की पहल के बाद अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विद्यार्थियों की शिकायतों पर तत्काल क्या कार्रवाई होती है और क्या इस बार समस्याओं का स्थायी समाधान सुनिश्चित किया जाता है।

    सबसे बड़ा सवाल: आखिर एकलव्य सैलाना में ही बार-बार क्यों बनती है ऐसी स्थिति?

    यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण है। शिकायतें सामने आती हैं, विद्यार्थी विरोध करते हैं, अधिकारी पहुंचते हैं, बातचीत होती है, आश्वासन दिए जाते हैं और कुछ समय बाद फिर असंतोष सामने आ जाता है। इस पूरी कड़ी में कहीं न कहीं शिकायत निवारण और निगरानी की व्यवस्था की समीक्षा जरूरी दिखाई देती है।

    क्या विद्यालय में विद्यार्थियों की समस्याएं सुनने के लिए नियमित बैठक होती है? क्या छात्रावासों का औचक निरीक्षण किया जाता है? क्या विद्यार्थियों को अपनी शिकायत बिना किसी भय या दबाव के रखने का अवसर मिलता है? क्या हर शिकायत पर कार्रवाई की समयसीमा निर्धारित होती है? और क्या अधिकारियों को यह जानकारी रहती है कि पिछली शिकायतों का वास्तव में समाधान हुआ या नहीं?

    इन सवालों का जवाब प्रशासन को देना चाहिए।

    साथ ही, यह भी स्पष्ट रहना चाहिए कि किसी विद्यालय में विरोध होना अपने आप में प्रत्येक शिकायत को सही साबित नहीं करता। विद्यार्थियों की हर मांग का तथ्यात्मक परीक्षण होना चाहिए और विद्यालय प्रबंधन का पक्ष भी सुना जाना चाहिए। लेकिन यदि शिकायतें बार-बार सामने आ रही हैं, तो उन्हें केवल अनुशासनहीनता कहकर खारिज करना भी उचित नहीं होगा।

    विद्यार्थियों की बात सुनना और अनुशासन बनाए रखना एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। दोनों जिम्मेदारियां साथ निभानी होंगी।

    क्या बच्चों में संयम की कमी है या व्यवस्था संवाद में विफल हो रही है?

    इस घटनाक्रम का एक दूसरा पहलू भी है। विद्यार्थियों का अपनी समस्याओं को लेकर आवाज उठाना उनका अधिकार है, लेकिन 20 किलोमीटर पैदल चलकर जिला मुख्यालय पहुंचने जैसी स्थिति यह सोचने पर मजबूर करती है कि विद्यालय स्तर पर संवाद की व्यवस्था कितनी कारगर है।

    बच्चों को अपनी बात संयम, अनुशासन और लोकतांत्रिक तरीके से रखने की शिक्षा मिलनी चाहिए। परीक्षा के दौरान नियमों का पालन करना, शिक्षकों के निर्देशों का सम्मान करना और विद्यालय की व्यवस्था बनाए रखना भी विद्यार्थियों की जिम्मेदारी है।

    लेकिन अनुशासन का अर्थ यह नहीं हो सकता कि विद्यार्थियों की वास्तविक समस्याओं को सुना ही न जाए। यदि किसी विद्यार्थी को लगता है कि उसकी शिकायत पर कार्रवाई नहीं हो रही, तो उसे अपनी बात रखने के लिए विश्वसनीय व्यवस्था मिलनी चाहिए। ऐसी व्यवस्था नहीं होने पर नाराजगी बढ़ सकती है और विरोध का रूप ले सकती है।

    दूसरी ओर, शिक्षकों और वार्डनों पर भी पढ़ाई, अनुशासन, छात्रावास प्रबंधन और बच्चों की सुरक्षा जैसी अनेक जिम्मेदारियां होती हैं। यदि स्टाफ की कमी, संसाधनों का अभाव या प्रशासनिक दबाव है, तो उस स्थिति की भी निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए। हालांकि ऐसी किसी कठिनाई के आधार पर बुनियादी सुविधाओं की कमी या शिकायतों की अनदेखी को उचित नहीं ठहराया जा सकता।

    इसलिए जांच केवल यह पता लगाने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए कि विद्यार्थी विरोध क्यों कर रहे हैं। यह भी देखना होगा कि विद्यालय में ऐसा माहौल बनाने के लिए क्या किया गया, जहां बच्चों को अपनी समस्या रखने के लिए बार-बार आंदोलन का रास्ता चुनना पड़ रहा है।

    कलेक्टर और जनजातीय कार्य विभाग के सामने अब जवाबदेही की परीक्षा

    कलेक्टर अजय कटेसरिया, सैलाना एसडीएम सुनील जायसवाल और जनजातीय कार्य विभाग की सहायक आयुक्त प्रियंका राय सहित संबंधित अधिकारियों के सामने अब चुनौती केवल विद्यार्थियों को समझाकर वापस भेजने की नहीं है। वास्तविक चुनौती उन कारणों की पहचान करना है, जिनके चलते विद्यालय में बार-बार असंतोष सामने आ रहा है।

    इस मामले में कुछ कदम तत्काल उठाए जाने चाहिए—

    विद्यालय में विषयवार शिक्षकों की उपलब्धता और रिक्त पदों की स्थिति सार्वजनिक की जाए।

    छात्रावास, वॉशरूम, पेयजल और भोजन व्यवस्था का संयुक्त निरीक्षण कर कमियों की सूची तैयार की जाए।

    पूर्व में विद्यार्थियों द्वारा उठाई गई शिकायतों और उन पर हुई कार्रवाई का रिकॉर्ड जांचा जाए।

    छात्र-छात्राओं से अलग-अलग बातचीत कर उनकी समस्याएं सुनी जाएं, ताकि वे बिना दबाव के अपनी बात रख सकें।

    छात्रावासों में निगरानी, शिकायत निवारण और विद्यार्थियों के मानसिक एवं भावनात्मक सहयोग की व्यवस्था की समीक्षा हो।

    प्रत्येक कमी को दूर करने के लिए जिम्मेदार अधिकारी और समयसीमा तय की जाए तथा बाद में अनुपालन की जांच हो।

    इन कदमों से ही पता चलेगा कि प्रशासन समस्या की जड़ तक पहुंचना चाहता है या मामला शांत होने के बाद फिर पुरानी स्थिति लौट आएगी।

    वर्षा की मौत के बाद उठे सवालों से भी लिया जाए सबक

    15 सितंबर को वर्षा सोलंकी की मौत के बाद मजिस्ट्रियल जांच के आदेश दिए गए थे। उस घटना के वास्तविक कारण और जिम्मेदारी का निर्धारण जांच के निष्कर्षों तथा उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही किया जाना चाहिए। वर्षा की मौत को वर्तमान विरोध का निश्चित कारण मानना भी उचित नहीं होगा।

    फिर भी, एक ही परिसर में छात्रावास की व्यवस्थाओं को लेकर पहले विरोध, फिर छात्रा की मौत के बाद तनाव और अब बुनियादी सुविधाओं की शिकायतों के साथ विद्यार्थियों का जिला मुख्यालय पहुंचना—इन घटनाओं को पूरी तरह अलग-अलग करके देखना भी पर्याप्त नहीं होगा।

    प्रशासन को यह समझना होगा कि आवासीय विद्यालयों में बच्चों की जिम्मेदारी केवल कक्षा में पढ़ाने तक सीमित नहीं है। बच्चे परिवार से दूर रहते हैं। उन्हें पढ़ाई, भोजन, स्वच्छता, सुरक्षा और भावनात्मक सहयोग की जरूरत होती है। उनकी समस्याओं को समय रहते सुनना और उनका समाधान करना संस्थान की कार्यप्रणाली का अनिवार्य हिस्सा होना चाहिए।

    अब आश्वासन नहीं, परिणाम चाहिए

    एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय सैलाना में बार-बार उठ रहे सवालों का समाधान किसी एक बैठक, एक निरीक्षण या एक दिन के विरोध को समाप्त करने से नहीं होगा। इसके लिए विद्यालय की पूरी व्यवस्था की निष्पक्ष समीक्षा करनी होगी।

    यदि शिक्षकों की कमी है तो उसे दूर करना होगा। यदि सफाई व्यवस्था खराब है तो जिम्मेदारी तय करनी होगी। यदि विद्यार्थियों की शिकायतों पर कार्रवाई नहीं होती तो शिकायत निवारण की प्रक्रिया बदलनी होगी। यदि अनुशासन संबंधी समस्याएं हैं तो उनके समाधान के लिए संवाद, परामर्श और स्पष्ट नियमों की व्यवस्था करनी होगी।

    और यदि विद्यालय प्रबंधन या संबंधित अधिकारियों की लापरवाही प्रमाणित होती है, तो नियमानुसार कार्रवाई भी होनी चाहिए।

    सबसे बड़ा सवाल यही है—आदिवासी बच्चों को बेहतर भविष्य देने के लिए बने एकलव्य विद्यालय में आखिर बच्चों को अपनी बुनियादी समस्याएं सुनाने के लिए 20 किलोमीटर पैदल चलकर कलेक्ट्रेट क्यों पहुंचना पड़ा?

    इस सवाल का जवाब किसी एक विद्यार्थी, शिक्षक या अधिकारी पर आरोप लगाकर नहीं मिलेगा। जवाब मिलेगा तथ्यों की जांच, जिम्मेदारियों के निर्धारण और व्यवस्था में वास्तविक सुधार से।

    क्योंकि एकलव्य विद्यालय का उद्देश्य केवल बच्चों को परीक्षा में सफल बनाना नहीं, बल्कि उन्हें सुरक्षित वातावरण, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सम्मानजनक जीवन का अवसर देना है। अब समय है कि इस उद्देश्य को कागजों और आश्वासनों से निकालकर धरातल पर उतारा जाए।

    रिपोर्टर जितेन्द्र कुमावत