रतलाम
रतलाम जिले में वन्यजीवों की सुरक्षा को लेकर वन विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। रविवार को कनेरी रोड स्थित पुलिस लाइन के सामने एक दर्दनाक घटना ने वन विभाग की संवेदनशीलता और तत्परता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए।
सड़क दुर्घटना में घायल हुई एक नीलगाय करीब तीन घंटे तक दर्द से तड़पती रही, लेकिन वन विभाग का कोई भी अधिकारी या कर्मचारी मौके पर नहीं पहुंचा। अंततः समय पर उचित सहायता नहीं मिलने से मूक जीव ने दम तोड़ दिया।
घटना की सूचना सुबह लगभग 8:11 बजे कैन हेल्पिंग फाउंडेशन की टीम को मिली। बताया गया कि कनेरी रोड पर एक नीलगाय दुर्घटना का शिकार होकर गंभीर रूप से घायल अवस्था में पड़ी हुई है। सूचना मिलते ही संस्था के सदस्य सक्रिय हुए और तत्काल मौके के लिए रवाना हो गए। इसी दौरान वन विभाग को भी सूचित करने का प्रयास किया गया, लेकिन विभाग का कोई आधिकारिक हेल्पलाइन नंबर उपलब्ध नहीं होने के कारण टीम ने दो डिप्टी रेंजरों को सीधे फोन लगाया।
संस्था के पदाधिकारियों के अनुसार, अधिकारियों द्वारा हर बार की तरह केवल "हम आ रहे हैं" कहकर आश्वासन दिया जाता रहा, लेकिन करीब तीन घंटे गुजर जाने के बावजूद वन विभाग का कोई प्रतिनिधि मौके पर नहीं पहुंचा। इस दौरान घायल नीलगाय दर्द से कराहती रही।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए कैन हेल्पिंग फाउंडेशन ने अपने स्तर पर निजी चिकित्सक को मौके पर बुलाकर इलाज शुरू कराया
और मूक जीव को बचाने का हरसंभव प्रयास किया। हालांकि गंभीर चोटों और समय पर सरकारी सहायता नहीं मिलने के कारण इलाज के दौरान ही नीलगाय ने दम तोड़ दिया।
नीलगाय की मौत के बाद भी संस्था ने मानवता का परिचय देते हुए नगर निगम से संपर्क किया और जेसीबी मशीन की सहायता से पूरे सम्मान के साथ उसका अंतिम संस्कार कराया।
रेस्क्यू के नाम पर सिर्फ आश्वासन, मैदान में हमेशा सामाजिक संस्थाएं
कैन हेल्पिंग फाउंडेशन के पदाधिकारियों ने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर तीखा आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा कि रतलाम में वन्यजीवों के रेस्क्यू के दौरान विभाग की लापरवाही कोई नई बात नहीं है। अधिकांश मामलों में सामाजिक संस्थाओं को ही अपनी जान जोखिम में डालकर रेस्क्यू अभियान चलाना पड़ता है, जबकि जिम्मेदार विभाग समय पर मौके पर नहीं पहुंचता।
संस्था का आरोप है कि कई बार इस संबंध में डीएफओ सहित उच्च अधिकारियों को भी अवगत कराया गया, लेकिन समस्याओं के समाधान की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
परिणामस्वरूप वन्यजीवों की सुरक्षा भगवान भरोसे होती जा रही है।
उठे बड़े सवाल
जब वन्यजीवों की सुरक्षा की जिम्मेदारी वन विभाग की है, तो घायल नीलगाय के लिए तीन घंटे तक कोई क्यों नहीं पहुंचा?
जिले में वन्यजीव रेस्क्यू के लिए आज तक प्रभावी हेल्पलाइन नंबर क्यों नहीं बनाया गया?
क्या विभागीय लापरवाही के कारण एक बेजुबान की मौत के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होगी?
आखिर कब तक सामाजिक संस्थाएं ही वन विभाग का दायित्व निभाती रहेंगी?
इस घटना ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि यदि जीवों की रक्षा का दायित्व संभालने वाला विभाग ही समय पर सक्रिय नहीं होगा, तो बेजुबान वन्यजीवों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित हो पाएगी? अब जिलेवासियों और सामाजिक संगठनों ने मांग की है कि मामले की उच्चस्तरीय जांच कर दोषी अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए तथा वन्यजीवों के लिए एक सक्रिय और 24 घंटे संचालित हेल्पलाइन व्यवस्था तत्काल शुरू की जाए।
रिपोर्टर जितेन्द्र कुमावत