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भूरिघाटी (राजसमंद)। आदिवासी धरती की पावन मिट्टी पर एक बार फिर जीवंत हो उठी प्राचीन परंपरा की महिमा! वाग्धारा संस्था के तत्वावधान में ग्राम भूरिघाटी में आयोजित हलमा कार्यक्रम ने पूरे क्षेत्र को जोश और उत्साह से भर दिया। यह कोई साधारण श्रमदान नहीं था, बल्कि सैकड़ों दिलों की एकता का ज्वलंत उदाहरण था जो जल संरक्षण तालाब पुनर्जीवन और ग्राम स्वराज की दिशा में एक यादगार कदम साबित हुआ। गांव के हर घर से निकलकर लोग एकजुट हुए और प्रकृति मां की रक्षा के लिए पसीना बहाया। यह दृश्य देखकर लग रहा था मानो पूरा गांव एक विशाल परिवार बनकर खड़ा हो गया हो। कार्यक्रम की शुरुआत सुबह से ही जोरदार रही। गांव के सभी परिवारों ने बढ़-चढ़कर भागीदारी निभाई। प्रत्येक घर से कम से कम एक सदस्य हलमा में शामिल हुआ। बच्चे, महिलाएं युवा, बुजुर्ग — सबकी आंखों में एक ही सपना चमक रहा था अपने तालाब को नया जीवन देना। धूल भरी गलियों से लेकर तालाब किनारे तक हर जगह गूंज रही थी सामूहिकता की मधुर धुन। लोग गा-गाकर हंसते-बोलते, एक-दूसरे का साथ देते हुए पत्थर उठा रहे थे मिट्टी खोद रहे थे और तालाब की दीवारों को मजबूत बना रहे थे। यह दृश्य न सिर्फ प्रेरणादायक था बल्कि आदिवासी संस्कृति की जीवंत मिसाल भी। वाग्धारा संस्था की ब्लॉक कोऑर्डिनेटर श्रीमती रेणुका पोरवाल ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जल संरक्षण के महत्व पर जोरदार प्रकाश डाला। उन्होंने भावुक स्वर में कहा यह छोटा सा तालाब हमारे गांव के लगभग 100 परिवारों की जीवन रेखा है। खेती सिंचाई और पशुपालन — सब इसी पर निर्भर है। सूखे की मार झेल चुके हम जानते हैं कि पानी कितना कीमती है। आज हम सबने मिलकर पिचिंग कार्य कर तालाब की जल संचयन क्षमता बढ़ाई है, मिट्टी कटाव रोका है और इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित बनाया है। रेणुका के शब्दों ने हर किसी के मन को छू लिया। उनके नेतृत्व में ग्रामीणों ने एक-एक पत्थर उठाकर तालाब की मुंडेर को मजबूत किया। महिलाएं भी पीछे नहीं रहीं। सिर पर पानी के घड़े और हाथों में औजार लेकर वे पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर काम किया। बच्चे उत्साह से पत्थर चुन रहे थे जबकि बुजुर्ग अपनी अनुभव की कहानियां सुनाते हुए नई पीढ़ी को प्रेरित कर रहे थे। कृषि एवं आदिवासी स्वराज संगठन के अध्यक्ष शंकर मइड़ा ने अपने संबोधन में गांव की सामुदायिक एकजुटता की भूरि-भूरि प्रशंसा की। उन्होंने कहा हलमा हमारी आत्मा है। जब कोई परिवार मुश्किल में होता था खेत तैयार करने थे तालाब खोदना होता था या कोई सामुदायिक कार्य करना होता था, तब पूरा गांव बिना किसी स्वार्थ के एक हो जाता था। आज हम उसी परंपरा को पुनर्जीवित कर रहे हैं। यूनिट लीडर धर्मेंद्र सिंह चुंडावत ने हलमा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा प्राचीन काल में हलमा केवल श्रमदान नहीं बल्कि प्रेम सहयोग और सामूहिक जिम्मेदारी का प्रतीक था। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम इस अमूल्य विरासत को भूलते जा रहे हैं। लेकिन भूरिघाटी ने आज साबित कर दिया कि हमारी संस्कृति अभी जिंदा है। कार्यक्रम में ग्राम स्वराज के सक्रिय सदस्यों — हरचंद मइड़ा अतुल मइड़ा सोहन मइड़ा रामचन्द्र खराड़ी सविता बाई गरवाल लीला बाई गरवाल सतीश मइड़ा सचिव दर्शन मइड़ा और पूर्व सरपंच कालू मइड़ा — ने अग्रणी भूमिका निभाई। इन सभी ने न सिर्फ खुद श्रमदान किया बल्कि अन्य ग्रामीणों को भी निरंतर प्रेरित किया। हलमा का सफल संचालन प्रवीण चारपोटा ने किया। उनके साथ पंचायत सचिव मानसिंह मुनिया वाग्धारा संस्था की सामुदायिक सहजकर्ता आभा चारपोटा काली भूरिया कपिल वसुनिया बालचंद डामोर बालाराम चारपोटा अनिल कटारा मगन डोडियार रमेश चारपोटा शंकर मुनिया और दर्जनों अन्य ग्रामीणों ने इस कार्यक्रम को यादगार बनाया। यह हलमा केवल तालाब की सफाई या पिचिंग तक सीमित नहीं था। यह एक बड़ा संदेश था — हम मिलकर कर सकते हैं जल संरक्षण के साथ-साथ आदिवासी संस्कृति के संरक्षण का भी यह अभियान था आज के दौर में जहां जल स्तर तेजी से गिर रहा है जहां सूखा और बाढ़ जैसी आपदाएं आम हो गई हैं वहां भूरिघाटी जैसे गांवों का यह सामूहिक प्रयास एक मिसाल बन गया है। |