रतलाम। भवन निर्माण और माता के इलाज के लिए उधार ली गई कुल 6 लाख रुपये की राशि के भुगतान के लिए दिए गए चेक बाउंस होने के मामले में आरोपी आसिफ हुसैन पिता भुरा खाँ को न्यायालय से बड़ा झटका लगा है। सप्तम अपर सत्र न्यायाधीश रतलाम राजेश नामदेव की अदालत ने आरोपी द्वारा प्रस्तुत आपराधिक अपील को निरस्त करते हुए निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा को बरकरार रखा है। न्यायालय ने आरोपी की अनुपस्थिति को देखते हुए उसे सजा वारंट के माध्यम से कारावास भेजने के लिए आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।
मामला रतलाम के टेलीफोन कॉलोनी निवासी आसिफ हुसैन और इंदिरा नगर निवासी गौरव सतवानी से जुड़ा है। परिवादी के अनुसार आसिफ हुसैन ने भवन निर्माण के लिए आवश्यकता बताते हुए 6 जुलाई 2017 को गौरव सतवानी से 4 लाख रुपये उधार लिए थे। इस राशि के संबंध में इकरारनामा और प्रोमिसरी नोट भी निष्पादित किया गया था। इसके बाद 10 जनवरी 2018 को आरोपी ने अपनी माता के इलाज के लिए आवश्यकता बताते हुए 2 लाख रुपये और उधार लिए। दोनों रकम की अदायगी के लिए भारतीय स्टेट बैंक के दो चेक दिए गए, जिनकी कुल राशि 6 लाख रुपये थी।
गौरव सतवानी ने निर्धारित समय पर दोनों चेक बैंक में भुगतान के लिए प्रस्तुत किए, लेकिन खाते में पर्याप्त राशि नहीं होने के कारण दोनों चेक अनादरित हो गए। इसके बाद अधिवक्ता बी.एस. पाटिल के माध्यम से आरोपी को कानूनी नोटिस भेजकर राशि का भुगतान करने की मांग की गई। नोटिस मिलने के बावजूद भुगतान नहीं होने पर गौरव सतवानी ने परक्राम्य लिखित अधिनियम की धारा 138 के तहत न्यायालय में निजी परिवाद प्रस्तुत किया।
अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट श्रीमती सपना शर्मा की अदालत ने 20 नवंबर 2025 को आरोपी आसिफ हुसैन को दोषी ठहराते हुए एक वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी। साथ ही 6 लाख रुपये की चेक राशि पर 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित 9.78 लाख रुपये प्रतिकर परिवादी को अदा करने के निर्देश दिए गए थे। प्रतिकर राशि जमा नहीं करने की स्थिति में चार माह के अतिरिक्त सश्रम कारावास का आदेश भी दिया गया था।
इस फैसले के खिलाफ आरोपी ने सप्तम अपर सत्र न्यायालय में आपराधिक अपील क्रमांक 226/2025 प्रस्तुत की। आरोपी की ओर से अधिवक्ता असलम खान तथा परिवादी गौरव सतवानी की ओर से अधिवक्ता बी.एस. पाटिल उपस्थित हुए।
अपील की सुनवाई के दौरान आरोपी की ओर से यह बचाव लिया गया कि चेक सुरक्षा के रूप में दिए गए थे और उनका दुरुपयोग किया गया। न्यायालय ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। निर्णय में कहा गया कि आरोपी ने संबंधित चेक पर अपने हस्ताक्षर होने से इनकार नहीं किया है। साथ ही इकरारनामा और प्रोमिसरी नोट सहित दस्तावेजी साक्ष्यों से लेन-देन की पुष्टि होती है। न्यायालय ने यह भी माना कि चेक अनादरित होने तथा कानूनी नोटिस के बाद भी भुगतान नहीं करने के तथ्य पर्याप्त रूप से साबित हुए हैं।
सप्तम अपर सत्र न्यायाधीश राजेश नामदेव ने 17 अगस्त 2026 को निर्णय घोषित करते हुए कहा कि विचारण न्यायालय ने साक्ष्यों का उचित मूल्यांकन किया है और उसके निर्णय में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है। इसके साथ ही आरोपी की अपील निरस्त कर दोषसिद्धि एवं दंडादेश को यथावत रखा गया।
निर्णय में आरोपी की अनुपस्थिति को गंभीरता से लेते हुए मूल प्रकरण विचारण न्यायालय को भेजने तथा आरोपी की उपस्थिति सुनिश्चित कराकर सजा वारंट के माध्यम से केंद्रीय कारागार रतलाम भेजे जाने के निर्देश दिए गए हैं। मामले में परिवादी की ओर से अधीनस्थ न्यायालय एवं अपील न्यायालय में अधिवक्ता बी.एस. पाटिल एवं रूखसाना शेख ने पैरवी की।
रिपोर्टर जितेन्द्र कुमावत