विशेष आलेख
आगर-मालवा। मध्य प्रदेश के आगर-मालवा जिले की नलखेड़ा तहसील में लखुंदर नदी (प्राचीन नाम लक्ष्मणा नदी) के तट पर स्थित माँ बगलामुखी का सिद्धपीठ धार्मिक आस्था, तंत्र साधना और ऐतिहासिक विरासत का अद्भुत संगम है। दस महाविद्याओं में से एक माँ बगलामुखी को समर्पित यह धाम देशभर के श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र है। मान्यता है कि नलखेड़ा स्थित यह मंदिर विश्व के तीन प्रमुख स्वयंभू माँ बगलामुखी पीठों में से एक है। अन्य दो पीठ मध्य प्रदेश के दतिया और नेपाल में स्थित बताए जाते हैं। तांत्रिक साधना और धार्मिक मान्यताओं के कारण इस धाम की विशिष्ट पहचान है। यह पवित्र स्थल जिला मुख्यालय आगर से लगभग 35 किलोमीटर तथा उज्जैन से करीब 100 किलोमीटर दूर स्थित है।
सतयुग से जुड़ी है माँ बगलामुखी के प्राकट्य की कथा
पौराणिक ग्रंथ प्राणतोषिणी के अनुसार, सतयुग में जब विनाशकारी तूफान से सृष्टि पर संकट उत्पन्न हुआ, तब भगवान विष्णु ने सौराष्ट्र स्थित हरिद्रा सरोवर के तट पर घोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर चतुर्दशी तिथि को माँ बगलामुखी प्रकट हुईं और उन्होंने सृष्टि की रक्षा की।
महाभारत काल से जुड़ी एक अन्य मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण के निर्देश पर धर्मराज युधिष्ठिर ने कौरवों पर विजय प्राप्त करने की कामना से यहाँ पीली पूजन सामग्री के साथ माँ बगलामुखी की आराधना की थी। इसी कारण यह स्थल विजय, शक्ति और साधना के प्रमुख केंद्र के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
मंदिर का जीर्णोद्धार विक्रम संवत 1816 में हुआ था। मंदिर परिसर में स्थित 16 स्तंभों वाला सभामंडप अपनी प्राचीन वास्तुकला का परिचय देता है। मान्यता के अनुसार, इसका निर्माण लगभग 252 वर्ष पूर्व कारीगर श्री तुलाराम ने करवाया था। मंदिर के सामने स्थित लगभग 80 फीट ऊँची दीपमालिका का निर्माण महाराजा विक्रमादित्य द्वारा कराया जाना माना जाता है।
एक ही शिला में विराजित हैं माँ बगलामुखी, लक्ष्मी और सरस्वती
वास्तुकला और धार्मिक मान्यताओं की दृष्टि से माँ बगलामुखी मंदिर की अपनी विशिष्ट पहचान है। गर्भगृह में एक ही स्वयंभू शिला में त्रिशक्ति के दर्शन होते हैं। मध्य में माँ बगलामुखी गदा धारण किए शत्रु की जिह्वा पकड़े हुए विराजमान हैं। उनके दाईं ओर माँ लक्ष्मी और बाईं ओर माँ सरस्वती के दर्शन होते हैं।
मंदिर की यह अनूठी प्रतिमा श्रद्धालुओं के आकर्षण का प्रमुख केंद्र है। परिसर में दक्षिणमुखी हनुमान मंदिर, उत्तरमुखी गोपाल मंदिर और पूर्वमुखी भैरव मंदिर भी स्थित हैं। मंदिर का सिंहमुखी मुख्य द्वार इसकी भव्यता को और बढ़ाता है।
पीला रंग प्रिय, हल्दी अर्पित करने की विशेष परंपरा
माँ बगलामुखी को पीताम्बरा भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, पीला रंग माँ को अत्यंत प्रिय है। इसी कारण यहाँ पीले वस्त्र धारण कर पूजा-अर्चना करने और हल्दी अर्पित करने की परंपरा प्रचलित है। मंदिर में खड़ी हल्दी अर्पित करना भी एक विशिष्ट धार्मिक परंपरा मानी जाती है।
श्रद्धालु यहाँ शत्रु बाधा से मुक्ति, मुकदमों में सफलता, कार्यों में आने वाली बाधाओं के निवारण और मनोकामना पूर्ति की कामना से माँ के दरबार में पहुँचते हैं। मंदिर में धार्मिक परंपराओं के अनुसार हवन, अनुष्ठान और मिर्ची हवन जैसी विशेष पूजन विधियाँ भी संपन्न कराई जाती हैं।
नवरात्रि में उमड़ता है श्रद्धालुओं का सैलाब
नलखेड़ा तहसीलदार एवं मंदिर प्रबंध समिति के प्रबंधक श्री प्रियंक श्रीवास्तव ने बताया कि माँ बगलामुखी धाम मालवा क्षेत्र के प्रमुख धार्मिक पर्यटन स्थलों में शामिल है। उनके अनुसार, सामान्य दिनों में प्रतिदिन लगभग 8 से 10 हजार श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुँचते हैं। नवरात्रि, माँ बगलामुखी जयंती तथा प्रत्येक मंगलवार और शुक्रवार को श्रद्धालुओं की संख्या बढ़कर 40 से 50 हजार या उससे अधिक हो जाती है।
शारदीय और चैत्र नवरात्रि के अवसर पर देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालु, साधक और विशिष्ट अतिथि माँ के दर्शन के लिए पहुँचते हैं। इन अवसरों पर मंदिर परिसर में विशेष धार्मिक गतिविधियाँ आयोजित होती हैं और पूरे क्षेत्र में भक्तिमय वातावरण रहता है।
सिंहस्थ-2028 को ध्यान में रखकर विकास की तैयारी
माँ बगलामुखी धाम के विकास और श्रद्धालुओं की सुविधाओं को बढ़ाने के लिए भी प्रयास किए जा रहे हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उज्जैन विकास प्राधिकरण द्वारा सिंहस्थ-2028 को ध्यान में रखते हुए लगभग 68 करोड़ रुपये का टेंडर किया गया है। इसके अंतर्गत देवी लोक के प्रथम चरण का निर्माण प्रस्तावित है।
मंदिर का प्रबंधन मध्य प्रदेश शासन के धर्मस्व विभाग और स्थानीय मंदिर प्रबंध समिति के माध्यम से किया जाता है। मंदिर के गर्भगृह को स्वर्ण और चाँदी से सुसज्जित किया गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, गर्भगृह में तीन करोड़ रुपये से अधिक मूल्य का स्वर्ण और लगभग 65 लाख रुपये की चाँदी लगी हुई है।
श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा के लिए व्यापक इंतजाम
शारदीय नवरात्रि के दौरान श्रद्धालुओं की सुविधा, सुरक्षा और सुचारु दर्शन व्यवस्था के लिए मंदिर प्रबंध समिति द्वारा व्यापक इंतजाम किए गए हैं। मंदिर में प्रातः 5 बजे से रात्रि 9 बजे तक दर्शन की व्यवस्था रहती है। शासन द्वारा निर्धारित शुल्क के अनुसार हवन और अन्य धार्मिक अनुष्ठान कराए जाते हैं।
मंदिर परिसर में नवीन यज्ञशाला और 200 से अधिक हवन कुंडों की व्यवस्था की गई है। मंदिर तक पहुँचने के लिए अस्थायी पैदल पुल का निर्माण कराया गया है। श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए धर्मशाला, भोजन की सुविधा के लिए भोजनशाला और पेयजल के लिए पर्याप्त वाटर कूलर तथा अन्य जल स्रोत उपलब्ध कराए गए हैं।
वाहनों की पार्किंग के लिए सीसीटीवी कैमरों से युक्त चार बड़ी पार्किंग बनाई गई हैं। सुरक्षा व्यवस्था के लिए 50 सुरक्षा गार्ड तथा स्वच्छता बनाए रखने के लिए 40 सफाईकर्मियों की व्यवस्था की गई है। इसके अतिरिक्त लखुंदर नदी के तट पर स्नान घाट भी उपलब्ध हैं।
नवरात्रि पर्व के दौरान माँ पीताम्बर सेवा समिति, नलखेड़ा द्वारा श्रद्धालुओं के लिए निःशुल्क भंडारे का आयोजन किया जाता है। इससे दूर-दराज से आने वाले भक्तों को भोजन की सुविधा मिलती है।
सड़क, रेल और हवाई मार्ग से पहुँच सकते हैं श्रद्धालु
माँ बगलामुखी धाम नलखेड़ा सड़क मार्ग से इंदौर, उज्जैन, भोपाल और कोटा सहित कई प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है। नलखेड़ा से इंदौर की दूरी लगभग 158 किलोमीटर और उज्जैन की दूरी करीब 100 किलोमीटर बताई जाती है। निकटतम प्रमुख रेलवे स्टेशन उज्जैन के साथ आलोट भी है, जबकि निकटतम प्रमुख हवाई अड्डा इंदौर में स्थित है।
शारदीय नवरात्रि के पावन अवसर पर माँ बगलामुखी धाम में दर्शन, पूजन और साधना के लिए श्रद्धालुओं का आगमन इस बात का प्रमाण है कि यह स्थल केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि मालवा की धार्मिक आस्था, प्राचीन परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण केंद्र है। माँ पीताम्बरा के दरबार में भक्त श्रद्धा और विश्वास के साथ शीश नवाते हैं तथा सुख-समृद्धि और मंगलमय जीवन की कामना करते हैं।
✍️ जगदीश चंद्र मालवीय
आगर-मालवा