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शासकीय आवास में रहने के भी होते हैं कायदे-कानून, अपनी पसंद के गीतों का शोर दूसरों पर थोपना कहां तक उचित? पांच परिवारों की नींद पर भारी पड़ रहा एक अधिकारी का संगीत प्रेम सरकारी नौकरी में पद, प्रतिष्ठा और जिम्मेदारियों के साथ कुछ सामाजिक मर्यादाएं भी जुड़ी होती हैं। शासकीय आवास मिलना किसी अधिकारी या कर्मचारी को केवल रहने की सुविधा प्रदान करना नहीं है, बल्कि उसके साथ यह अपेक्षा भी जुड़ी होती है कि वह सार्वजनिक जीवन की शालीनता, अनुशासन और दूसरों की सुविधाओं का सम्मान करेगा। लेकिन जब कोई व्यक्ति सरकारी आवास को अपनी निजी महफिल और आसपास रहने वाले परिवारों को अपना श्रोता समझने लगे, तो यह निश्चित ही विचारणीय विषय बन जाता है। आगर-मालवा की एक शासकीय आवासीय कॉलोनी इन दिनों कुछ ऐसी ही स्थिति से गुजर रही है। बाहर से देखने पर यह कॉलोनी हरियाली, स्वच्छता, शांति और अनुशासित वातावरण का सुंदर उदाहरण नजर आती है। यहां विभिन्न विभागों के अधिकारी-कर्मचारी अपने परिवारों के साथ रहते हैं। सभी की दिनचर्या लगभग एक जैसी है। सुबह नौकरी की भागदौड़, दिनभर की जिम्मेदारियां और शाम को घर लौटकर परिवार के साथ कुछ सुकून के पल बिताने की उम्मीद। लेकिन इसी सुकून में एक ऐसा व्यवधान पैदा हो गया है, जिसने आसपास रहने वाले परिवारों की दिनचर्या प्रभावित कर रखी है। शाम होते ही शुरू हो जाता है दर्द भरे नगमों का दरबार एक शासकीय आवास में अकेले रहने वाले एक अधिकारी को संगीत का विशेष शौक है। शौक होना अच्छी बात है, लेकिन जब वही शौक दूसरों के लिए परेशानी का कारण बनने लगे तो उसकी सीमा और मर्यादा पर सवाल उठना स्वाभाविक है। बताया जाता है कि शाम होते ही उनके आवास से तेज आवाज में साउंड सिस्टम पर पुराने दर्द भरे नगमे और गजलें गूंजने लगती हैं। कभी मुकेश के विरह गीत तो कभी प्रदीप के भावुक नगमे। आवाज इतनी तेज होती है कि आसपास के आवासों में रहने वाले परिवारों तक संगीत की पूरी महफिल बिना किसी आमंत्रण के पहुंच जाती है। एक ही ब्लॉक में छह परिवार निवास करते हैं। पांच परिवार अपनी सामान्य दिनचर्या में व्यस्त रहते हैं, लेकिन एक आवास से उठने वाली तेज आवाज बाकी परिवारों के आराम और शांति में खलल डालती है। किसी का शौक, दूसरे की परेशानी क्यों बने? संगीत सुनना व्यक्तिगत पसंद है। कोई भजन सुनना पसंद करता है, कोई गजल तो कोई फिल्मी गीत। लेकिन सरकारी आवास की दीवारों के पार भी दूसरे परिवारों का जीवन है। वहां छोटे बच्चे हैं, बुजुर्ग हैं, महिलाएं हैं और दिनभर काम करने के बाद आराम की अपेक्षा रखने वाले लोग हैं। क्या किसी एक व्यक्ति की संगीत संबंधी पसंद इतनी महत्वपूर्ण हो सकती है कि बाकी पांच परिवारों की सुविधा और शांति को नजरअंदाज कर दिया जाए? क्या सरकारी आवास में रहने का अर्थ यह है कि व्यक्ति अपनी इच्छा के अनुसार पूरे परिसर का वातावरण तय कर सकता है? और सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह कि क्या एक शासकीय सेवक से इतनी सामान्य नागरिक समझ और सामाजिक जिम्मेदारी की अपेक्षा भी नहीं की जानी चाहिए? पद के साथ व्यवहार में भी दिखना चाहिए अनुशासन शासकीय अधिकारी और कर्मचारी समाज के सामने एक जिम्मेदार वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनसे अपेक्षा रहती है कि वे नियमों का पालन करने के साथ अपने आचरण से भी उदाहरण प्रस्तुत करें। कार्यालय में अनुशासन की बात करना और अपने निजी व्यवहार में दूसरों की सुविधा की अनदेखी करना दोहरे मापदंड का परिचायक है। सरकारी आवास किसी की निजी जागीर नहीं होता। यह साझा आवासीय व्यवस्था का हिस्सा है, जहां प्रत्येक निवासी को समान रूप से शांति, सुरक्षा और सम्मान के साथ रहने का अधिकार है। संगीत के शौकीन अधिकारी को भी अपनी पसंद के गीत सुनने का पूरा अधिकार है, लेकिन यह अधिकार दूसरों की शांति और निजता की कीमत पर नहीं हो सकता। प्रशासन को भी ऐसे मामलों में संवेदनशीलता दिखानी चाहिए यह मामला किसी व्यक्ति के संगीत प्रेम का विरोध नहीं, बल्कि सार्वजनिक आवासीय परिसर में रहने की बुनियादी मर्यादाओं का है। यदि किसी की गतिविधि से लगातार दूसरे परिवार परेशान हो रहे हैं तो संबंधित आवासीय व्यवस्था के जिम्मेदार अधिकारियों को भी इस दिशा में ध्यान देना चाहिए। ध्वनि प्रदूषण से जुड़े निर्धारित नियमों और आवासीय परिसर की व्यवस्था का पालन सभी के लिए समान रूप से आवश्यक है। किसी अधिकारी का पद या विभागीय पहचान उसे दूसरों की सुविधा की अनदेखी करने का विशेषाधिकार नहीं देती। आखिर सरकारी आवास में रहने का मतलब भी समझना होगा सरकारी आवास में रहना केवल छत और चार दीवारों का सुख प्राप्त करना नहीं है। यह एक सामूहिक व्यवस्था का हिस्सा बनकर रहने की जिम्मेदारी भी है। यहां रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को यह समझना होगा कि उसकी स्वतंत्रता वहीं तक है, जहां से दूसरे की परेशानी शुरू न हो। इसलिए संगीत सुनिए, गाइए, अपने शौक पूरे कीजिए, लेकिन आवाज इतनी रखिए कि आपके आनंद से किसी दूसरे परिवार की नींद, बच्चों की पढ़ाई और बुजुर्गों का आराम प्रभावित न हो। क्योंकि सरकारी आवास में रहने का असली सलीका ऊंची आवाज में गाने से नहीं, बल्कि दूसरों को सुकून से जीने देने से साबित होता है। आखिर शौक अपने लिए होने चाहिए, दूसरों को परेशान करने के लिए नहीं। |