रतलाम/सैलाना
रतलाम और झाबुआ की आदिवासी पट्टी में हल्दी की खेती अब किसानों के लिए आत्मनिर्भरता की नई राह बनती जा रही है। खेतों में लहलहाती हल्दी केवल मसाले की फसल नहीं, बल्कि हजारों परिवारों के लिए आय और आत्मविश्वास का मजबूत आधार बन रही है। इस बदलाव में वाग्धारा संस्था की पहल महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
संस्था ने अपने कार्यक्षेत्र के लगभग 2000 गांवों में दो लाख से अधिक परिवारों को हल्दी के बीज उपलब्ध कराए हैं। इसके साथ ही किसानों और महिलाओं को हल्दी की खेती, समूह निर्माण और पोषण वाटिका से जुड़ा प्रशिक्षण भी दिया गया।
ग्राम स्वराज और सक्षम समूहों की महिलाओं के माध्यम से यह संदेश घर-घर तक पहुंचाया गया कि हल्दी घरेलू उपयोग के साथ-साथ आय का भी अच्छा स्रोत बन सकती है।
सैलाना क्षेत्र के महुडीपाड़ा गांव के किसान कचरी बाई ने बताया कि पहले वे केवल घर के उपयोग के लिए थोड़ी हल्दी उगाते थे, लेकिन समूह बैठकों से जानकारी मिलने के बाद उन्होंने एक बीघा खेत में हल्दी की खेती शुरू की। उनका कहना है कि हल्दी की खेती में लागत कम लगती है और जोखिम भी अपेक्षाकृत कम होता है, जिससे किसानों को अच्छा लाभ मिलने की संभावना रहती है।
इस पहल में महिलाओं की भागीदारी खास तौर पर देखने को मिल रही है। सकरावदा गांव की राजूबाई बताती हैं कि पिछले दो वर्षों से उन्हें बाजार से हल्दी खरीदने की जरूरत नहीं पड़ी।
घरेलू उपयोग के बाद बची हल्दी को बेचकर उन्हें अतिरिक्त आय भी मिल रही है। वहीं अनीताबाई का कहना है कि अब वे अपने खेत की शुद्ध हल्दी का उपयोग करती हैं, जो स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए बेहतर है।
कांगसी गांव की कई महिलाएं भी घरेलू जरूरत पूरी करने के बाद बची हल्दी स्थानीय व्यापारियों को बेचकर आय अर्जित कर रही हैं। इससे बच्चों की पढ़ाई और घर की अन्य जरूरतों के लिए आर्थिक सहायता मिल रही है।
हल्दी की यह पहल केवल आर्थिक बदलाव नहीं ला रही, बल्कि महिलाओं की सामाजिक भागीदारी भी बढ़ा रही है। सामुदायिक प्रयास और सही मार्गदर्शन से हल्दी की खेती अब इस क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की नई पहचान बनती जा रही है।
Reporter Jitendra Kumawat