रतलाम / सैलाना
रतलाम जिले के सैलाना नगर में धार्मिक आस्था और दान की पवित्रता से जुड़ा एक पुराना मामला अब चर्चा के केंद्र में आ गया है। वर्ष 1982 में धार्मिक एवं आश्रम संबंधी कार्यों के लिए दान में दी गई एक मकान और भूमि को बाद में निजी व्यक्तियों को बेच दिए जाने के दस्तावेज सामने आने के बाद नगर में तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। सामाजिक संगठनों और नागरिकों ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग उठाई है।
प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार, सैलाना निवासी श्रीमती इन्द्रकुंवर ठाकुर, पत्नी स्वर्गीय लोकपाल सिंह कोठड़ा ने 4 अक्टूबर 1982 को एक पंजीकृत दान पत्र के माध्यम से महात्मा गांधी मार्ग स्थित वार्ड क्रमांक-8 (वर्तमान में वार्ड क्रमांक-11, मकान नंबर-35) की अपनी मकान और भूमि श्री राजानंदजी गुरु श्री नित्यानंदजी महाराज को धार्मिक उद्देश्य से दान स्वरूप प्रदान की थी।
दस्तावेजों में स्पष्ट उल्लेख किया गया था कि दानकर्ता की कोई संतान नहीं थी और उन्होंने अपनी स्वतंत्र इच्छा से बिना किसी दबाव, प्रलोभन अथवा लालच के यह संपत्ति धार्मिक कार्यों, आश्रम और जनहित से जुड़े उपयोग के लिए समर्पित की थी। उस समय संपत्ति का मूल्य करीब 10 हजार रुपये दर्शाया गया था तथा उप पंजीयक कार्यालय रतलाम में इसका विधिवत पंजीयन कराया गया था। दान पत्र में यह भी उल्लेख था कि दानकर्ता जीवनभर उसी मकान में लाइसेंसी के रूप में निवास करती रहेंगी।
मामले ने तब नया मोड़ ले लिया जब वर्षों बाद सामने आए एक विक्रय दस्तावेज में इसी संपत्ति को राजानंद गुरु श्री नित्यानंदजी महाराज द्वारा लगभग 1 लाख 95 हजार रुपये में संदीपकुमार पिपरोदिया एवं श्रीमती शशिकांता देवी जैन के नाम बेचने का उल्लेख मिला। विक्रय पत्र में संपत्ति को पुराना खंडहरनुमा मकान और खाली भूमि बताया गया है।
जानकारी के अनुसार, महाराज द्वारा यह तर्क दिया गया कि सैलाना की उक्त संपत्ति धार्मिक कार्यों में उपयोग नहीं हो पा रही थी तथा धौंसवास स्थित धार्मिक स्थल और अन्य धार्मिक गतिविधियों के लिए धन की आवश्यकता होने के कारण उक्त संपत्ति का विक्रय किया गया। हालांकि, इस तर्क के बावजूद कई लोगों का कहना है कि जब संपत्ति विशेष रूप से नित्यानंद स्वामी आश्रम और धार्मिक कार्यों के उद्देश्य से दान की गई थी, तब उसे निजी विक्रय के माध्यम से बेचना गंभीर कानूनी और नैतिक प्रश्न खड़े करता है।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि दान की गई संपत्ति सार्वजनिक धार्मिक उद्देश्य के लिए थी, तो उसके स्वरूप और उपयोग में परिवर्तन किस आधार पर किया गया, इसकी जांच आवश्यक है। दस्तावेजों में स्वयं विक्रेता द्वारा यह स्वीकार किया गया है कि संपत्ति उन्हें पंजीकृत दान पत्र के माध्यम से प्राप्त हुई थी।
मामले के सामने आने के बाद नगर में यह चर्चा भी तेज हो गई है कि कहीं धार्मिक आस्था और दान की भावना की आड़ में मूल्यवान संपत्तियों के हस्तांतरण का खेल तो नहीं हुआ। नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने दान पत्र की शर्तों, संपत्ति के वर्तमान स्वामित्व और पूरे प्रकरण की कानूनी समीक्षा कर निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है।
सैलाना में यह मामला अब केवल जमीन और मकान का विवाद नहीं रह गया है, बल्कि धार्मिक विश्वास, दान की पवित्रता और समाज के भरोसे से जुड़ा एक संवेदनशील मुद्दा बन गया है। यदि दस्तावेजों में दर्ज तथ्यों की पुष्टि होती है, तो यह मामला आने वाले दिनों में और भी बड़ा रूप ले सकता है।
सुचना
इस मामले से जुड़े दस्तावेजों और तथ्यों की पड़ताल लगातार जारी है। आने वाले दिनों में इस प्रकरण से जुड़े कई और महत्वपूर्ण खुलासे सामने आ सकते हैं।
दान पत्र, विक्रय दस्तावेज और संपत्ति के वर्तमान स्वामित्व से जुड़ी अगली बड़ी अपडेट के लिए हमारे साथ बने रहें। बहुत जल्द इस मामले की अगली कड़ी आपके सामने होगी।
रिपोर्टर जितेन्द्र कुमावत